Saturday, January 7, 2012

सतर्क हथेलियों के बीच

 
हथेलियों के बीच
सहेज कर रखना
लौ दिए की
जीवन जैसी
जगमग करती
पथ को उजियारे का स्नान करवाती
झूमती है
आस्था की लय पर
सुनाती है
सदियों पुराना
शाश्वत गान
 
शक्ति संचरित होती है
हर संकट सह जाने की
इस लौ से
जो
सुरक्षित है
सतर्क हथेलियों के बीच
 
असावधान होने पर
बुझ भी सकती है
अब सोचने वाली बात ये है 
की 
तुम्हारी सुरक्षा
इस पथ प्रदर्शित लौ से है
या फिर
तुम्हारे अपनी सतर्कता से
 
 
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका 
७ जनवरी २०१२                 

3 comments:

अनुपमा त्रिपाठी... said...

इस पथ प्रदर्शित लौ से है
या फिर
तुम्हारे अपनी सतर्कता से

गहन भाव ...
पथ प्रदर्शित करती रचना ...

Amrita Tanmay said...

हमारा हममें कुछ नहीं ..जो भी है केवल उसका है.. सुन्दर रचना ..

प्रवीण पाण्डेय said...

संस्कृति को ऐसे ही सजाये आगे ले जाना है।

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