Tuesday, May 31, 2011

आंतरिक शुद्धि




पहले हम जमा करते हैं
कुछ इसलिए की
होती है आवश्यकता
कुछ इसलिए की 
हो जाते हैं सक्षम
और फिर
वस्तुओं के प्रति
एक मोह सा
चुपचाप घर बना लेता है
हमारे भीतर

हम उन सब चीज़ों से
बंध जाते हैं
जो घेरे होती हैं हमें
फिर 
एक दिन
हम अपने ही बंदीगृह में बैठे
उस बिखराव को देखते हैं
जिसे पहले हम
विस्तार मान बैठे थे


चूक 
एक बार नहीं
निरंतर होती है
पर मुख्य रूप से
चूकना वह है
जिसमें हम
अपनी चूक को पहचानने से
चूक जाते हैं


मुक्ति के लिए
तीक्ष्ण स्पष्टता 
और
स्फूर्ति दोनों का साथ चाहिए

जाग्रति बाहरी परिवर्तन के लिए
आती तो है
भीतर से ही

और भीतर जाने के लिए
बाहर देखना होता है
ऐसे जैसे की वो है

भीतर से स्वच्छ हुए बिना
हो ही जाती है 
मिलावट हमारे देखने में
तो बात वहां तक पहुँची की
आंतरिक शुद्धि कोई वैकल्पिक नहीं
अनिवार्य विषय है

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
३१ मई २०११   
           

Monday, May 30, 2011

मुक्ति का अनुनाद



सुबह की हवा
पंछियों की बोलियाँ
कितना मीठा संगीत
प्रकृति प्रस्तुत है
अपने सौन्दर्य और 
मन को उल्लसित करते
शुद्ध स्वरों के साथ

और हम
या तो धरे रह जाते
अपने घर की दीवारों में
या फिर
घर से निकल कर भी
बंदी बने रहते
सोच की दीवारों के

 
लो टप-टप
टपकी बूँदें
उभरी नई सी ध्वनि
बादलों से
और सुबह सुबह
सूर्य को चुनौती देते 
काले बादलों ने भी
रच दिया
अँधेरे -उजाले का एक 
नया संधि काल

बूंदों की छम छम
छेड़ गयी कैसा राग
उमड़ रहा आल्हाद


बरखा के साथ भी
सम्बन्ध बदल जाता है
थोड़ी देर बाद

बूंदों के संगीत 
बिजली के बोल
और
महीन मौन के पार
हम फिर लौटना चाहते हैं 
अपने अधूरे संकल्पों की धरा पर
पर
बिजली की गड़गड़ाहट
खींच लेती है ध्यान

इस रिम-झिम में
तन्मयता के साथ 
सहसा मिल जाता
मुक्ति का अनुनाद 

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
३० मई २०११  
 
    
     
      
     

Sunday, May 29, 2011

रोशनी के घेरे से


दिन की सीढ़ियों की संख्या
बदलती जाती है हर दिन

कोई निर्देशक
नृत्य करवाने मुझसे
करता है संकेत
अब यहाँ
अब यहाँ
फिर वहां खड़े होकर
बनाओ मुद्राएँ

इस ताल पर ऐसे 
झुकना उठाना वहां

उस लय संग थिरक कर
फिर तुरंत हट जाना
रोशनी के घेरे से

निर्देशक अदृश्य है
स्थितियां भी
सजाता है
अनायास ही 
नए नए ढंग से
मुझे नचाने

और तब
जब नृत्य निर्देशक के
हाव भाव समझ कर
अपनी सम्पूर्णता से
झूमता हूँ
एकमेक हुआ
उसके आत्म-संयोजन संग

दृश्यों का बहाव
अनुभूति का सौंदर्य
रंगों का प्रकटन
और
संतोष प्रद सार सागर तक की
यात्रा
मेरे ह्रदय में
खोल देती है
उपहार 
अक्षय प्यार का

जिसे बांटने 
फिर फिर नृत्य करता
और हर कदम 
मेरे पांवों से कृतज्ञता की 
मगल छाप पड़ती है
धरती पर
 तब
लगता है
हाँ, नृत्य निर्देशक को
भला लगा है
नृत्य मेरा

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२९ मई २०११
                    

Saturday, May 28, 2011

अनंत सम्भावना का सूरज


जैसे चलते चलते
कभी भी एक वाहन किसी दूसरे वाहन से
या किसी पेड़ से
या फिर रास्ते में किसी दीवार से टकरा सकता है


ऐसे ही
मन की गाडी 
ध्यान चूकने पर
शाश्वत फल का स्वाद छोड़
अपने ही किसी लघु रूप से टकरा कर
लहुलुहान कर सकती है हमें


गंतव्य तक पहुँच पाना तो दूर
टक्कर खाकर
गंतव्य का पता भूल
किसी 'क्षुद्र स्थल' तक
ले जाने को तैयार हो जाता मन

जहां पहुँच कर
एक घेरे के बंदी बन
हम कसमसाते हैं
छटपटाते हैं
मन की 'मिस्टेक' को 
समझ नहीं पाते हैं


पूर्व स्मृतियों से 
जब 
किसी अनुग्रह क्षण में
प्रकट होता है
अनंत सम्भावना का सूरज

तब हमें स्मरण होता है
निश्छल प्यार का झरना
तब हम चाहते हैं
सबकी सेवा करना

तब
न जाने कैसे
मन की टक्कर से हुई टूट-फूट
ठीक हो जाती है

सरस मन तब सचमुच
  आनंदित और शीतल है,
जब अनंत में रमे रहने की
भावना हो जाती प्रबल है  


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२८ मई २०११ 
 
         

Friday, May 27, 2011

शायद चला आये वह


लिखने से नहीं
करने से होगा
लिखना करना नहीं 
होना है

होना अपने साथ
वहां
जहाँ शून्य हो जाती हर बात
एक मौन सा रहता है साथ

और इस मौन में
खिल जाती है 
कोइ मधुर बात
जिस पर
असर नहीं करता कोइ आघात

शाश्वत हरियाली का सावन आता है
कैसे हो जाता है ऐसा
कालातीत स्वयं
एक क्षण में समाता है
खिलखिला कर हमें खिलाता है

 
जब जब 
ऐसे अनुपम, अलौकिक से क्षण को
सहेजने के प्रयास में
कुछ बनता-बनाता हूँ
ना जाने कैसे
इस निश्छल क्षण की आभा से
दूर हो जाता हूँ
वह नियंत्रण से परे है
है तो है
नहीं है तो नहीं है

फिर भी
लिख लिख कर
बुनता हूँ
वह वातावरण
जिससे खिंच कर
शायद चला आये वह
जो
न कहीं आता है
न जाता है
 
 
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२७ मई २०११    

कुछ बनाता हूँ
या स्वयं

Thursday, May 26, 2011

मुझे कुछ हो गया है








अब 
दिन पर दिन
बढ़ती जा रही आश्वस्ति
तुम्हारे साथ की,
उज्जवल परत
खुलने लगी है
हर एक बात की

अब
मेरी साँसों में
तुम्हारे होने की सौरभ का 
नशा सा छाया है,
उत्सुकता से देखता हूँ
हर स्थिति में
अब कौन सा रूप लेकर
मेरा चिर सखा आया है

अब 
उल्लास है, मस्ती है, आनंद है
पग पग पर
तुम्हारी कृपा का छंद है

मौन में उमड़ रहा है
मधुर आलाप,
जैसे ज्योतिस्तंभ प्रकट हो
हर ले सब संताप

ये किसने छू दिया है मुझको
इस तरह की
'मैं' है पर 'मैं' खो गया है
ऐसा लगता है
             मुझे कुछ हो गया है         

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२६ मई २०११    

Wednesday, May 25, 2011

रसीला खेल अनंत का




कविता कभी तकिया बन जाती है
कभी बिस्तर
कभी लिहाफ
और फिर
स्थूल से सूक्ष्म की तरफ चलती
नींद बन कर स्फूर्ति का रूप लेने के बाद
लहरों के साथ खेलने की ललक का
उपहार देकर
अब आई है
सूरज की किरण बन कर
सौंप कर नए दिन का उपहार
सौम्यता से दे रही है संकेत
उठो, चलो, अपनाओ
अपने आपको
विविध रूपों में
और 
देखो 
एक से अनेक
अनेक से एक
होने की 
यात्रा में छुपा
रसीला खेल अनंत का


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२५ मई २०११   
          

Tuesday, May 24, 2011

आलोक की गागर


स्तुतियों के मोद से
रुकते नहीं भास्कर
चलते चलते छलकाते
आलोक की गागर


पहले जब बच्चा था
निकर की जेब उंडेलने पर
निकलती थी कोई टूटी पेंसिल, कोइ रंग-बिरंगा पंख,
किसी पैकेट से निकली चमकती पन्नी

फिर पर्स, पेन, गाडी की चाबियाँ इत्यादी

और अब
जेब नहीं है वस्त्रों में
सबसे बहुमूल्य 
धडकनों में रहता हूँ
जिसे 
बिना किसी झिझक के
सबके सामने रखता हूँ
पर इसकी चमक
 कोई-कोई ही देख पाता है
इनमें से कोई बिरला ही इस चमक को छूकर देखने की
इच्छा जताता है
और 
यूं भी होता है
 कोई इस चमक को अपने साथ ही लिए जाता है
फिर भी
 अनंत आनंद की इस ज्योत्स्ना से
कुछ नहीं घट पाता है

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२४ मई २०११      
      

Monday, May 23, 2011

शेष है निरंतर


छोड़ कर
वह सब
जो सुना-समझा अब तक
छोड़ कर
छूट जाने की अकुलाहट भी

देखता रहा वह
आकारों का बनना-मिटना
रंगों का उभर कर लुप्त होना

छू-छू कर अद्रश्य करता रहा
हर परिधि

महसूस कर
ध्वनिराहित स्पंदन का विस्तार

गहन शांति में
मुस्कुराया वह

धरती छोर तक
फ़ैल गयी
उसकी निर्मल, निष्कलंक मुस्कान

शब्द सारे हो गए 'मैं'
वह 'मैं'
जो 'मैं' को छोड़ कर
शेष है निरंतर

अशोक व्यास
२३ मई ११
न्यूयार्क, अमेरिका           

हर तरफ हो गया उजाला


उजाले की चादर
जहां बिछाई
वहा नहीं दे
रही दिखाई
मन में उत्सव है निराला
हर तरफ हो गया उजाला


संभल संभल  कर
चलते चलते
जब 
उसके चलने और उड़ने का अंतर
खो गया,
सबको
संभाल कर रखने की
ताकत वाला
अब संभाल कर रख लेने जैसा
हो गया

ये सहेजने की लालसा नहीं
अंगड़ाई है
उसी सर्वोत्तम की
जो मुझे लेकर
शब्द डगर पर चलती है
और नई नई पौशाक
पहन लेने को मचलती है

उसी छूकर पावन हो गए परिधान
सज गयी शब्दों में, अनंत की पह्चान 


छल छला रहा आनंद रस
शुद्ध प्रेम है उजागर
चल पडा बताने सबको
शिखर की ओर जाकर

अशोक व्यास
          रविवार, मई २२, २०११                   

Saturday, May 21, 2011

'फंसा दिया ना!"


मिटने का डर मिटा, मस्त करना उसको आता है
मिटने में एक अमिट छुपा जो, उसको दिख जाता है


अब कविता नहीं
मौन
मौन  में उतरता है
ओस की बूँद सा
चुपचाप 
एक रसमय 
प्रसन्न, पुलकित भाव
विस्तार का सहज विवर्तन

इसके केंद्र में पहुच कर
जब ये जान पड़ता है की
हर कण में
केंद्र है इसी का

शब्द मुस्कुरा का
जिस क्षण
स्वयं भी
केंद्ररूप हो जाते हैं
उस क्षण
मौन, कविता और जीवन एक हो जाते हैं
फिर
मौन हो
कविता हो या जीवन
सत्ता एक ही है

यह सत्ता हमें सौंपने वाला
कितना उदार है
कितना महान है
और
चतुर भी
उसकी महिमा गाते गाते 
हम अपनी ही महिमा गाने लगते हैं
और
वो फिर हमें
अपने ही बुने हुए जाल में 
फंसता देख कर
खिलखिलाता है
'फंसा दिया ना!"

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
शनिवार, २१ मई २०११     

Friday, May 20, 2011

सारा जग जिसका रास





उसने
नए उत्साह से
देखा अपने भीतर
स्वर्णिम धारा का
सुन्दर, समन्वित प्रवाह
जाने कैसे
खुल गयी
इस गोपनीय स्थल तक
दृष्टि ले जाने वाली राह

तन्मय निश्चलता में
वह
जब घास पर लेटा
उसके कद जितना हो गया आकाश
हर दिशा से
सुनाई दे रही थी बस उसकी सांस

मुग्ध मौन में
संचरित निष्कलंक विश्वास
सौंप दी रास उसको
सारा जग जिसका रास


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२० मई २०११    
 
              

Thursday, May 19, 2011

एक सुन्दर तन्मयता



तुमने इतने समीप से देख लिया 
मुझे 
की अब मेरे एकांत में
तुम्हारे होने का अतिरिक्त बोध भी
ठहर गया है

पूरी तरह
मौन एकांत तक पहुँच कर
सम्पूर्ण स्वर्णिम धार को 
आवाहित करने का भाव लिए
जब देखता हूँ
अपने भीतर
नंदनवन की नीरवता 

सहसा सारे बोध
घुल-मिल कर
रच देते हैं
एक सुन्दर तन्मयता

वह सब 
जो छूट सकता है
छूट जाता है
बस एक 
अच्युत गाता है
एक अनूठा उद्भव है
न कोई सुनता है, न सुनाता है
पर कण कण में अनंत की गाथा है


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१९ मई २०११            

Wednesday, May 18, 2011

अंजुरी प्यार की


सत्य वही नहीं
जो दीखता है
सत्य वह भी नहीं जो 
बना लेते हम
अपनी सीमित समझ से
सत्य वह है
जो हमें बना कर 
देखता है
की कितने सजग हैं हम
आस-पास के खिलौनों से परे
उसे देखने में
जो सत्य रहता है हमेशा 
 
 
प्रवाह में अपने
अहंकार के जाल से
जिस मछली को पकड़ कर
मूल मान लिया है धारा का
 
वह मछली
अपने साथ 
उद्वेलित करने वाली गंध भी लाई है
कभी ईर्ष्या, कभी लोभ, कभी क्रोध
और कभी असहनीय छटपटाहट भोगती
यह मछली
अपनी गंध के साथ एकमेक कर हमें
भुला देती है
हमसे हमारा परिचय
 
 
अनवरत प्रवाह
हंस हंस कर
देता है आमंत्रण
आओ, तट छोड़ कर
जाल नहीं
अंजुरी प्यार की
पर्याप्त है
 
रम जाओ 
अनवरत प्रवाह में
सहज उछलते
नित्य मुक्त विस्तार में 


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१८ मई २०११  

Tuesday, May 17, 2011

सुनहरी हो गयी उसकी लिखाई


देखी जितनी जितनी ऊंचाई
दिखी है, उसकी ही गहराई

  नहीं रोता पहले की तरह
जब रूठ जाती है परछाई

 बड़े काम की लगती है अब
ये दौलत, जो उसने दिखाई

उसे देने को क्या है पास मेरे
अपनी पहचान, उसी से पाई   

माँ ने गोदी में लेके दिखलाया
सुनहरी हो गयी उसकी लिखाई   

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१७ मई २०११  

 

 

  



  
 

Monday, May 16, 2011

मेरी और तुम्हारी बातें


सारी बातें, प्यारी बातें
अपनेपन की मारी बातें

उससे मिलना,रहा अधूरा
बोल बोल कर, हारी बातें

बातों बातों सुधर गए जब
मिल जुल बहुत सुधारी बातें

समझने वाले समझ गए
छोड़ चले हत्यारी बातें

साथ नहीं रहने वाली हैं 
ये पतझड़ की मारी बातें

चाँद बादलों में छुप कर भी
करता कितनी सारी बातें

जाने कैसे हुई हमारी
मेरी और तुम्हारी बातें

जागे मन ने देख लिया है
नींद ले रही सारी बातें

मौन मिलन का बड़ा मधुर है
मिलने की तैय्यारी बातें


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१६ मई २०११   




      

Sunday, May 15, 2011

एक मौन खिलखिला रहा था


आज रास्ते में कोई कविता नहीं थी
आज रास्ता था ही नहीं
बस  मंजिल ही मंजिल थी

साथ कोई नहीं
पर अकेलापन भी नहीं था

आज
बादल बरस चुके थे
हरे हरे पत्तों में
एक मौन खिलखिला रहा था 
और
साफ़ आसमान  में
पंख लहरा कर उड़ता एक पंछी
ना जाने कैसे
आनंद से भिगो गया
कण कण


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१५ मई २०११      

Saturday, May 14, 2011

अपने ही शोर की कैद में

 
 
हम कब तक उलझे रहेंगे
मरने-मारने में,
जीवन के शुद्ध सौन्दर्य से परे
कब तक
हिंसा की ज्वाला
किसी एक विचार/अहंकार
 को स्थापति करने
या नकारने के लिए
विध्वंसक जीभ लिए
चाटती रहेगी बस्तियां



हम कब तक
भूले रहेंगे
प्रेम का शाश्वत सन्देश
संकीर्णता के नए नए फंदे
कब तक
कसते रहेंगे
बस्तियां
और
कराहों के बीच
कुछ नए काले बीज
अपनी विरासत मान कर
कब तक
करते रहेंगे हम
नफरत की खेती



पेड़, पर्वत
ज़मीन, आस्मां
हवा, झरने
ये सब
जो कुछ कहना चाहते रहे हैं
हमसे,
शायद
रखे रहेंगे अपनी
चुप्पी में यूं ही
और
अपने ही शोर की कैद में
साँसों के अंतिम छोर तक
पहुँचते हुए हम
जाने-अनजाने
छटपटाहट के
नए चिन्ह छोड़ते जायेंगे

4
क्या इस तड़प को
नहीं दे सकते
हम
प्रेम का वो उपहार
जिसके छूने मात्र से
सार्थक हो सकता है
हमारा होना

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१३ मई २०११


कविता

कविता न नारा न विज्ञापन कविता सत्य खोजता मेरा मन कविता न दर्शन न प्रदर्शन कविता अनंत से खेलता बचपन कव...