Monday, May 23, 2011

हर तरफ हो गया उजाला


उजाले की चादर
जहां बिछाई
वहा नहीं दे
रही दिखाई
मन में उत्सव है निराला
हर तरफ हो गया उजाला


संभल संभल  कर
चलते चलते
जब 
उसके चलने और उड़ने का अंतर
खो गया,
सबको
संभाल कर रखने की
ताकत वाला
अब संभाल कर रख लेने जैसा
हो गया

ये सहेजने की लालसा नहीं
अंगड़ाई है
उसी सर्वोत्तम की
जो मुझे लेकर
शब्द डगर पर चलती है
और नई नई पौशाक
पहन लेने को मचलती है

उसी छूकर पावन हो गए परिधान
सज गयी शब्दों में, अनंत की पह्चान 


छल छला रहा आनंद रस
शुद्ध प्रेम है उजागर
चल पडा बताने सबको
शिखर की ओर जाकर

अशोक व्यास
          रविवार, मई २२, २०११                   

1 comment:

Rakesh Kumar said...

छल छला रहा आनंद रस
शुद्ध प्रेम है उजागर
चल पडा बताने सबको
शिखर की ओर जाकर

अदभुत,अनुपम अनुभव.
शुद्ध प्रेम हो जब उजागर
उजाले की हो हर तरफ
लहर ही लहर.

आनंद रस बस यूँ ही छलकाते रहिये अशोक भाई.

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...