Thursday, May 19, 2011

एक सुन्दर तन्मयता



तुमने इतने समीप से देख लिया 
मुझे 
की अब मेरे एकांत में
तुम्हारे होने का अतिरिक्त बोध भी
ठहर गया है

पूरी तरह
मौन एकांत तक पहुँच कर
सम्पूर्ण स्वर्णिम धार को 
आवाहित करने का भाव लिए
जब देखता हूँ
अपने भीतर
नंदनवन की नीरवता 

सहसा सारे बोध
घुल-मिल कर
रच देते हैं
एक सुन्दर तन्मयता

वह सब 
जो छूट सकता है
छूट जाता है
बस एक 
अच्युत गाता है
एक अनूठा उद्भव है
न कोई सुनता है, न सुनाता है
पर कण कण में अनंत की गाथा है


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१९ मई २०११            

3 comments:

वन्दना said...

बहुत सुन्दर भावाव्यक्ति।

Rakesh Kumar said...

सहसा सारे बोध
घुल-मिल कर
रच देते हैं
एक सुन्दर तन्मयता

तन्मयता ही अभीष्ठ है.
आपकी सुन्दर तन्मयता का बोध कराती
अनुपम प्रस्तुति के लिए हृदय से आभार.

प्रवीण पाण्डेय said...

एक वही बोध तो है जो सदा साथ रहता है।

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...