Wednesday, May 25, 2011

रसीला खेल अनंत का




कविता कभी तकिया बन जाती है
कभी बिस्तर
कभी लिहाफ
और फिर
स्थूल से सूक्ष्म की तरफ चलती
नींद बन कर स्फूर्ति का रूप लेने के बाद
लहरों के साथ खेलने की ललक का
उपहार देकर
अब आई है
सूरज की किरण बन कर
सौंप कर नए दिन का उपहार
सौम्यता से दे रही है संकेत
उठो, चलो, अपनाओ
अपने आपको
विविध रूपों में
और 
देखो 
एक से अनेक
अनेक से एक
होने की 
यात्रा में छुपा
रसीला खेल अनंत का


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२५ मई २०११   
          

3 comments:

anupama's sukrity ! said...

एक से अनेक
अनेक से एक
होने की
यात्रा में छुपा
रसीला खेल अनंत का

वाकई ..सर्वव्यापी सर्वोपरि सर्वत्र विद्यमान ...!!

Rakesh Kumar said...

कविता को तकिया,बिस्तर,लिहाफ ,नींद,स्फूर्ति और फिर सूरज की किरण बनकर नए दिन का उपहार देते बहुत अच्छा लगा.और उपहार भी क्या ? एक सुन्दर उपदेश 'एक से अनेक और अनेक से एक होने की यात्रा' का,जिसमें छिपे अनन्त के रसीले खेल के अहसास का.
मैं तो नतमस्तक हूँ आपकी सुन्दर कल्पना के आगे.

मेरे ब्लॉग पर आकर आपने अपने सुन्दर सुवचनों
से पावन कर दिया.बहुत बहुत आभार आपका

प्रवीण पाण्डेय said...

अनंत के खेल भी लम्बे और आनन्ददायक होते हैं।

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...