Sunday, July 18, 2010

अनंत का नम स्पर्श



रुकता नहीं
रुक-रुक कर भी
चलता जाता है
एक कुछ
भीतर मेरे
जिसके संकेत पर
देख देख कर उसको
सुन्दर हो जाता है
हर संघर्ष
 
हर पीड़ा के पार
पहुँच कर
लगता है
हो गई अनावृत
उसकी स्वर्णिम आभा
कुछ और अधिक
पहले से

आश्वस्त आधार पर भी
ना जाने कैसे
रच देता वह
कुछ ऐसे कम्पन्न
कि मिल जाता मज़ा
लड़खड़ा कर सँभालने का

विराट की
विनोदप्रियता पहचान कर
कभी कभी
अनंत का नम स्पर्श
झलका है
मेरी मुस्कान में भी
और तब-तब
कृतकृत्य हुआ हूँ
पहले से कुछ ओर अधिक

इस धन्यता पर
सवाल उठाते सन्दर्भ
छीन लेना चाहते
मुझसे
परिपूर्णता का बोध
और मैं
द्रोपदी के चीर सी
अनवरत श्रद्धा से
उसकी मर्यादा बचाना चाहता 
अपने भीतर
जिसका नाम शाश्वत सत्य है


रविवार, १८ जुलाई २०१०
सुबह ४ बजे
--------------------------------------

कविता सेतु द्वारा
इस ब्लॉग पर अदृश्य रूप में
अपने अपने 'लोक' से मिलने वाले सभी आत्मीय, सहृदय पाठक मित्रों से निवेदन
-भारत यात्रा हेतु प्रस्थान कर रहा हूँ आज
अगस्त के प्रथम सप्ताह में पुनः ब्लॉग सक्रिय होगा
यदि भारत में सम्भावना हुई तो यह 'स्वानुसंधान की रसमय अभिव्यक्ति यात्रा
वहां से भी आप तक पहुँच पायेगी
आप सबको शुभकामनाएं देते हुए
यात्रा के लिए आपकी मंगल कामनाएं अपने साथ मानते हुए
धन्यवाद
सस्नेह -- अशोक
 

Saturday, July 17, 2010

कैसा रिश्ता है उम्मीद से मेरा


सुबह से शाम तक
एक बगूला सा उठता है
एक लहर ऐसी
जिसको किनारा नहीं 
असमान को छू लेने की जिद है
और मैं
चारो दिशाओं में
तलाशता फिरता
वो छडी
जिससे छूकर 
शांति कर दूं इस लहर को


लहर में 
शामिल है
वो सब जो दिखा
पर उससे ज्यादा वो
जो रह गया अनदेखा
वो सब जो हुआ
पर उससे ज्यादा वो
जो रह गया अनहुआ
लहर में
छुपी है
एक छटपटाहट 
और
अपने आपको 
फिर से सहेजने, संवारने
सँभालने की चाहत
ये कौन है
जो बदल कर
'सही होने का अर्थ'
सहसा
बड़ा सा प्रश्न चिन्ह लगा कर
मेरे अस्त्तित्व पर
छोटा सा
कर देता है मुझे
 
रेगिस्तान के 
एक अंदरूनी हिस्से में
होठों पर जमी पपड़ी से
रेत हटाता
दूर
मरीचिका देख कर
मुस्कुराता
हांफता
गिरता
चुपचाप
विराट रक्षक के आगे
गिड़गिड़ाता
पर 
हार मानते-मानते
फिर एक बार
चलने लगता
थका-थका लड़खडाता
कैसा रिश्ता है
उम्मीद से मेरा
इसे कभी 
छोड़ नहीं पाता

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
शनिवार, १७ जुलाई २०१०

 

Friday, July 16, 2010

हम जितना जानते हैं


1
कविता शाश्वत की सत्ता दिखलाती है
सत्य के प्रवाह में डुबकी लगाती है
रचना प्रक्रिया सूक्ष्म का मान बढ़ा 
असीम स्नेह को पुकार लगाती है
२ 
भीड़ के पास 
नहीं है ताकत 
कि चुरा सके चैन तुम्हारा
अगर किसी
हर-भरे पेड़ की तरफ
बना रह पाए ध्यान तुम्हारा


हम जितना जानते हैं
उसके एक छोटे से अंश का
जिस क्षण कर लेते हैं प्रयोग
मिल जाती मुक्ति
बह आता आनंद का झरना
हो जाते निर्मल, निरोग

पर कुछ है
जो हममें जड़ता फैलाता है
हमारे देखने, महसूस करने की
पात्रता घटाता है

हम किसी के दिखाए 
को देख देख कर
उससे अपने लिए
एक कोठरी बनाते हैं
उस घेरे में
रहते रहते
सत्य की पहचान को
सीमित कर जाते हैं

फिर इस सीमा से
पार निकलने को
बेतरह छटपटाते हैं
इस कोशिश में
नाकाम रहने पर
विवश हो जाते हैं
अक्सर होता है
हम बार बार अपनी दिशा भूल जाते हैं
और गंतव्य से दूर होने के लिए
किसी और को दोषी ठहराते हैं
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ८ बज कर ३० मिनट
शुक्रवार, १६ जुलाई २०१०

Thursday, July 15, 2010

ध्यान किनारे पर रख कर



 
 
1
सुबह सुबह चिड़िया का स्वर
चिर आनंद प्रसाद मुखर
हर कोलाहल पार करो
शुद्ध शांति को अपना कर


पग-पग, छुप-छुप मिले भंवर
रुक मत जाना तुम फंस कर
हर एक गाँठ खुल जायेगी 
ध्यान किनारे पर रख कर 


अनुभव किताबों की तरह
शेल्फ में सजा कर
अक्सर
हम भूल जाते हैं 
उसकी इबारत

उसी तरह
धड़कता है दिल
पढ़ कर
पहली बारिश की
हवा का ख़त

अब जब 
हम जानते हैं
कि हमेशा नहीं रहता सावन
फिर भी
बेसुध कर देता है 
सोंधी माटी का बदन 
 
शायद सुन्दरता तब है
जब हमारा होना अनायास रहे 
पर स्थिरता के लिए जरूरी है
होने के पीछे सुमिरन का अभ्यास रहे 

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ५ बज कर १५ मिनट
गुरुवार, १५ जुलाई २०१०

Wednesday, July 14, 2010

भीतर की आंच का आकार



अपेक्षा के विपरीत
जब मिल जाए
कोई एक क्षण
उस पल 
देखो अपने
मन का दर्पण

देखो कितना कुछ कुम्हलाया
क्या कोई क्रोध का बादल मंडराया
 
 अपनी प्रतिक्रिया सहेजने का अभ्यास
रखता है सुन्दरता और मधुरता के पास 

अपने से बाहर के होने पर तो नहीं है हमारा अधिकार 
पर स्वयं तय कर सकते हैं, भीतर की आंच का आकार 

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ५ बजे
बुधवार, १४ जुलाई २०१०


Tuesday, July 13, 2010

पर सूरज है मुझमें


इस क्षण
और कुछ नहीं
सृजन बिंदु को टटोलते हुए
अपने 'स्व' को पूरी तरह
इस एक धुरी पर टिका कर
पूछ रहा 
उस मौन का पता
जहां
ना कोई प्रश्न, ना कोई उत्तर
ना कोई थपथपाहट
ना द्वार खोलने की आतुरता

विश्रांति की चिर-छाया में
सहज विस्तार की पावन अनुभूति
और 
ऐसा होना
जो रहता है
कुछ ना होते हुए भी
और सब कुछ होते हुए भी
उस प्रभाव से परे के
शुभ्र रूप में
घुल मिल
शब्द पंखों संग
जब उड़ रहा हूँ
स्वतः स्फूर्त है
सब तक पहुंचता 
प्यार का कोमल उजाला 
मैं सूरज नहीं हूँ
पर सूरज है मुझमें

अशोक व्यास
न्यूयार्क,अमेरिका
सुबह ७ बज कर ५५ मिनट 
मंगलवार, १३ जुलाई २०१०

Monday, July 12, 2010

वो जानता तो सब है


मेला समेटने वाला
अनदेखा करता है
धरती पर बिखरे 
उल्लास और उमंगों के रंग
 
उसे 
तो हर चिन्ह मिटाना है
फिर कहीं जाकर
नया मेला सजाना है

उसे मालूम तो है
वो सब
जो उमड़ता है
मेले के झकाझक उजाले में
वो झूले, वो भेल-पूरी, वो चाट, वो खेल
वो गुब्बारे
और बिना बात हँसते लोगो के रिश्ते

वो जानता तो सब है
शायद कभी 
वैसे भी आया था मेले में
जैसे कि और लोग आते हैं
पर अब
वो मेले को जीता नहीं
मेला परोसता है
खुशियों के पल रचने का आधार बनाता
वो ना जाने किस पल
समेट चुका है
अपना रिश्ता
घटती-बढ़ती खुशियों से
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ६ बज कर ५५ मिनट
सोमवार, १२ जुलाई २०१०



Sunday, July 11, 2010

वहां खुशबू का एक खज़ाना रहे




ज़िन्दगी का सफ़र सुहाना रहे
 मिलने-जुलने का एक बहाना रहे
 
रिश्ता इतना तो रह सके कायम
किसी के घर में आना-जाना रहे 
 
छेड़ता है  शगल हवाओं का 
मेरे भीतर कोई दीवाना रहे
 
आप चुपचाप लौट आये पर 
वहां खुशबू का एक खज़ाना रहे
 
रात भर इस पे लड़े वो दोनों 
किस दिशा की तरफ सिरहाना रहे

शहर में जा के ये भी जान लिया
शहर से दूर क्यूं सयाना रहे
 
रंग बदला है दिल की बातों का
तेज़ रफ़्तार अब ज़माना रहे
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ६ बज कर ४५ मिनट
रविवार, जुलाई ११, २०१०








Saturday, July 10, 2010

सारी दुनिया की दौलत से महंगे हैं




 फिर से वो अहसास पुराने लौटा दे
तेरी खुशबू भरे ज़माने लौटा दे 

अंदेशे की आहट दूर हटे जिनसे 
अब तो वो अंदाज़ पुराने लौटा दे

रस्ते से दीवार हटाने की जिद है
हिम्मत से भरपूर तराने लौटा दे

जो भी सोचूँ, उसमें तेरा अक्स रहे 
 तेरी चाहत भरे ज़माने लौटा दे

आग और पानी जिसको ना छू पायें 
उसकी नज़रों के नजराने लौटा दे


 सच्चाई का सूरज जो रोशन करते
धरती को ऐसे दीवाने लौटा दे

सारी दुनिया की दौलत से महंगे हैं 
यार मेरे दो-चार पुराने लौटा दे
 
अशोक व्यास
७ बज कर ३० मिनट
शनिवार, १० जुलाई २०१०



Friday, July 9, 2010

हर बंधन भी सुन्दर है


जाना पहचाना सा घर है
फिर भी कहीं नया डर है 
सुने कोई-कोई लेकिन
सबमें शाश्वत का स्वर है

कितनी सारी बातें हैं पर
भीतर मौन उजागर है
नदी भले छोटी सी हो पर
उसमें भी एक सागर है
लेकर भी हम रोते हैं
देकर मगन दिवाकर है 

 मुक्त हुआ ही देख सके 
हर बंधन भी सुन्दर है
तेरा- मेरा छूट गया तो 
सारा जग अपना घर है
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
शुक्रवार, ९ जुलाई 2010
 -----------------
जोधपुर निवासी आदरणीय शायर शीन कॉफ़ निजाम साहब की सलाह पर दो शेर संशोधित किये
'जाना पहचाना सा दर है' अब हो गया 'जाना पहचाना सा घर है'
और
'इतनी सारी बातें हैं पर' अब हो गया 'कितनी सारी बातें हैं पर'
मोहब्बत के साथ
बाँट ली अन्दर की बात
अशोक व्यास
रविवार, ११ जुलाई 2010

Thursday, July 8, 2010

दर्पण में तूफ़ान मिलेगा



कहाँ खबर थी शहर में अपने
हर कोई सुनसान मिलेगा
 
 परियों के प्यारे किस्सों से
हर कोई  अनजान मिलेगा
 
धूप पेड से यूँ पूछेगी 
कहो कहाँ इंसान मिलेगा
 
प्यासों के संग छोड़ के पानी 
और बड़ा सामान मिलेगा
 
भूल चलेगा अपना चेहरा
दर्पण में तूफ़ान मिलेगा
 
बड़े बड़े घर, अन्दर खाली
रास्ते पर दरबान मिलेगा
 
सारे बंधन छोड़ चलेंगे 
जब उसका फरमान मिलेगा
 
चलते चलते थक कर सोचा
अब वो खुद ही आन मिलेगा

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ६ बजे
गुरुवार, जुलाई ८, २०१० 
 


Wednesday, July 7, 2010

सीख सीख कर नहीं मिलेगी उंचाइयां

 
1
ले के फिर हो जाता है ऐसा
छोटी सी लगती है दुनिया
लेन-देन का खेल
अपेक्षा और प्राप्ति का युग्म
संतोष और असंतोष के छींटे
तब
जब लगता है कि
इस 'तेरे-मेरे' के खेल से आ चुके हैं बाहर
किसी एक क्षण सहसा
मिट जाता है 
बाहर भीतर का भेद 
विपरीत दिशा से
 
मुक्ति के क्षणों का विस्तार
लील लेता है या तो अहंकार
या फिर अपेक्षाओं का सत्कार
 
२ 
सीख सीख कर नहीं मिलेगी उंचाइयां 
मिल गयी लगी तो ठहरेंगी नहीं
इस शिखर तक पहुँचने की गोपनीयता
सदियों से बनी है 
ज्यूं की त्यूं
शायद इस तरह 
वो सर्वकालिक, समर्थ अपने
असीम सौंदर्य को
स्वच्छ और निर्मल रख लेने
हमारे हाथ में
प्रवेश की कुंजी देता नहीं है कभी
दे देता है बस यह भ्रम कि
हम जान गए हैं सब कुछ
और पहुँच गए हैं वहां
जहां विस्तार और सार पर हमारा अधिकार है


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ८ बज कर ४० मिनट
बुधवार, ७ जली २०१० 

Tuesday, July 6, 2010

जीवित होने का अर्थ गति है








वो सब 
जो कर लेना चाहिए था अब तक
और नहीं कर पाए हो
इसका शोक ना मनाओ
देखो
अब क्या कर सकते हो
सोचना छोड़ कर, करने में जुट जाओ 
 
परिवर्तन कल से नहीं
आज से
अभी से
इस क्षण से
कह कर
मुड गया वो
चलने लगा 
चलते चलते
दूर निकल गया
आँखों से ओझल हो गया जब 
तब मालूम हुआ 
परिवर्तन एक क्षण से शुरू भले ही हो
यह एक निरंतर प्रक्रिया है 
जिसमें ये याद रखना जरूरी है
कि हम जीवित हैं 
और जीवित होने का अर्थ गति है
और गति के लिए जड़ता को तोडना होता है
जड़ता के टूटने से परिवर्तन की कोपलें निकलती हैं
जीवन वृक्ष रचनात्मक परिवर्तन की शाखाओं के फैलने का नाम है
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ६ बज कर ३० मिनट
मंगलवार, ६ मई २०१०

Monday, July 5, 2010

आसमान तक जाने के लिए

(जल पर है आलोक मछुरिया -          चित्र- अशोक व्यास )


सहसा उसके आने से
शुरू हुई सभा की कार्यवाही
उठ गए उनींदे लोग
उत्साह में भर कर
सुनने लगे उसकी बातें
जिनमें उजियारा मचलता था 

"गणित से नहीं चलता मन 
पर मन का भी एक गणित है
जिसे जान कर भी मान नहीं पाते हम
 
देखो कोई कैसे पेड़ पर लगे झूले की गति तेज करता है
समझो वो जहां है, उसी बिंदु से गति का संचार करता है
 
अपने हिस्से की पीड़ा अगर पूरी तरह हटा दोगे 
तो जीवन के वैभव को भी अनजाने में घटा दोगे
 
आसमान तक जाने के लिए 
जोड़ के साथ ये भी जानो कि क्या घटाना है
और ठीक से देखो, तुम वो हो
जिसे नापने के लिए छोटा पड़ जाता हर पैमाना है"

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ७ बज आकर ४५ मिनट
सोमवार, ५ जुलाई २०१०

Sunday, July 4, 2010

वो आगे भी दिख जाएगा

 
बस एक आई थी जो
गर्म दोपहरी में 
३ घंटे की प्रतीक्षा के बाद
इस छोटे से गाँव के
बस स्टैंड पर से धूल उड़ाते हुए
निकल गयी 
अपनी तेज़ रफ़्तार में

मैंने देखा
उसने भी देखा
बस का इस तरह जाना
फिर सामान हाथों से, काँधे से उतार कर
फिर रख दिया पेड़ की छाया में

पर वह उदासीन सा था
इस सबके प्रति 
बल्कि मुस्कुरा ही रहा था
बस के यूँ निकल जाने पर

इस बार, 
पानी की बोतल से आखिरी घूँट पीकर
जब मैंने फिर से 
स्थिति को कोसने के लिए 
कुछ कहना चाहा
उसने मेरी ओर देखा
बिना कुछ कहे 
ना जाने कैसे कह दिया
'जो है
सब ठीक है
वो करो 
जो कर सकते हो
उसे स्वीकारो
जो हो रहा है
कोसने से हल नहीं आता है
बस ये होता है
तन के साथ मन भी जल जाता है'

उसकी आँख देख कर
ना जाने कैसे
पहली बार मुझे लगा 
स्थिति इतनी बुरी भी नहीं 
मैं तो बस गाँव का अनुभव लेने आया था
प्रतीक्षा भी अनुभव के बढ़ने का हिस्सा है
 सहसा कहीं से शीतल हवा चली 
वो व्यक्ति अब मेरी ओर देख कर मुस्कुराया
बिन बोले बोला
'मैं तो बस तुम्हे ये बताने आया था
घबराना मत
हर अनुभव तुम्हारा हिस्सा है
और तुम जिसका हिस्सा हो
वो साथ रहता है 
हर अनुभव में तुम्हारे
कभी ऐसे जैसे मैं हूँ
और कभी अदृश्य रूप में'
 
मेरे मन में प्रसन्नता का नृत्य फूटा 
मुख पर मुस्कान उतरी
आँख इस अनाम अनुभूति का स्वाद पचाने के लिए
मुंद गयीं अपने आप

और कुछ क्षण बाद
अपने आप में मगन 
चखता, सूंघता, सहेजता रहा 
एक करूणामय अज्ञात की स्नेहिल उपस्थिति को
फिर बस के आने का स्वर सुन
 देखने लगा
आती हुई बस को
तब सहसा देखा
पेड़ की नीचे 
वह व्यक्ति नहीं है
ना उसका सामान
मैं ही हूँ 
बस की प्रतीक्षा में अकेला

तो क्या....
चलती बस से पीछे मुड कर
देखने की कोशिश करने लगा
शायद वो दिख जाए
इस बीच
कन्डक्टर ने आकर कहा
'पीछे क्या देख रहे हो बाबूजी 
आगे देखो 
जिसे पीछे देख रहे हो
वो आगे भी दिख जाएगा'
 
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ८ बज कर १५ मिनट 
रविवार, ४ जुलाई २०१० 





Saturday, July 3, 2010

शिखर तक दौड़ कर



ना जाने कैसे 
अपने मन में
अपनी ही अपेक्षित छवि
का रूप बदल जाता है,
समय के साथ
कामनाओं का नया रूप
निखर कर
नया आकार रच जाता है
 
पहले जिस पटरी से
जुड़ा होता है 
बोध अपनी पहचान का,
बाद में, उस पटरी का
अस्तित्व ही
नहीं रह जाता है 


हम जो हैं
हमारे होने का जो मर्म है
वो किसी छवि पर निर्भर नहीं है
ये आत्म-निर्भरता 
सहेज पाने का अवकाश 
हमारे पास निरंतर नहीं है 

जब एक छवि से छूट जाते हैं
तो दूसरी छवि बनाते हैं
एक कैद से दूसरी कैद तक 
ख़ुशी ख़ुशी पहुँच जाते हैं
 
३ 
 
चलो आज यूँ करें 
शिखर तक दौड़ कर जाते हैं
विस्तार की पुकार लेकर
विराट तक अर्जी पहुंचाते हैं
 
पर कहेंगे क्या उससे 
जब वो पूछेगा 
हम किसी 'सीमित छवि' के पीछे 
बार बार उसको भूल क्यूं  जाते हैं?
 
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
सुबह ९ बज कर १५ मिनट 
शनिवार, ३ जुलाई २०१० 

Friday, July 2, 2010

कोई मंगल भाव नित्य लहराता है


एक क्षण ऐसा जब
यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है
मैं लिखता हूँ कविता
या शब्द द्वारा कोई मुझे रचता जाता है
 
मैं जिसकी रचना हूँ, वो
हर दिन मुझे नए सिरे से रचता है
फिर भी बीते हुए कल से कुछ
 आने वाले कल के लिए बचता है
 
आज अपने 'अगले-पिछले' सबका सम्मलेन बुलाया है
जिससे किसी की करूणा का पथ उजागर हो आया है
 

क्यूं याद आई, इतने बरसों बाद 
 गंगा की डुबकी, दादा की याद
 
यूँ लगता है, सारा अनुभव बस कल का था 
जब, गंगा में स्मृतिरस नयनों से छलका था

जीवन का मुखरित रूप तो बीत जाता है
पर कोई मंगल भाव नित्य लहराता है
जब जब उनकी यादों का झोंका आता है
मन सहज ही पावनता का प्रसाद पाता है 
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ८ बज कर १० मिनट पर
शुक्रवार, २ जुलाई २०१०

Thursday, July 1, 2010

सीखो अर्पण, जीओ अर्पण


 
 इक क्षण ऐसा
कि ब्रह्मज्ञान पर ताला
कोई उतार देता है
पहनी हुई माला
अब ना सुख-चैन, ना शांति
ना प्रेम की मधुशाला,
फिर से अमृत पिपासा लेकर
भटकता है मतवाला


जो किया उससे बंधन
जो ना किया, उससे बंधन
इस तरह बंधन से बंधन तक
चलता है जीवन

एक दिन ऐसा
सीख का खुरदुरा आँगन
हाँ, बहुत कहा- सुना
पर सीखा नहीं समर्पण


चलो अपने आप
सुनो मन की थाप
ऐसे अपनाओ किरणे 
आशीष बन जाए ताप
 
होता है सबसे प्यारा
अपने हिस्से का उजियारा
स्वच्छ करती है गति 
जीवन बहती धारा 

हर अनुभव में
बुनो मंगल गीत
घटती नहीं कभी
अक्षय है प्रीत 

गुरु कर देते संशय निरसन
हर घटना में छुपा है विकसन
सीखो अर्पण, जीओ अर्पण
खुल जाएगा हर एक बंधन 


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ७ बज कर ३० मिनट
गुरुवार, १ जुलाई 2010


आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...