Wednesday, July 14, 2010

भीतर की आंच का आकार



अपेक्षा के विपरीत
जब मिल जाए
कोई एक क्षण
उस पल 
देखो अपने
मन का दर्पण

देखो कितना कुछ कुम्हलाया
क्या कोई क्रोध का बादल मंडराया
 
 अपनी प्रतिक्रिया सहेजने का अभ्यास
रखता है सुन्दरता और मधुरता के पास 

अपने से बाहर के होने पर तो नहीं है हमारा अधिकार 
पर स्वयं तय कर सकते हैं, भीतर की आंच का आकार 

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ५ बजे
बुधवार, १४ जुलाई २०१०


6 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

भीतर की लौ को मध्यम ही रखना होगा।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...
This comment has been removed by the author.
संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

अपने से बाहर के होने पर तो नहीं है हमारा अधिकार
पर स्वयं तय कर सकते हैं, भीतर की आंच का आकार

यह तय करना आ जाये तो जीवन सार्थक हो जाये

सूर्यकान्त गुप्ता said...

संगीता स्वरूपजी से सहमत। अच्छी कविता।

वन्दना said...

बेहतरीन विश्लेषण्।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

मंगलवार 19 जुलाई को आपकी रचना ... चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर ली गयी है आभार

http://charchamanch.blogspot.com/

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