Friday, April 19, 2013

यह सब जो खो जाना है

 
यह सब जो खो जाना है 
ये सब 
इतना शांत 
इतना सुन्दर 
अभी 
सूर्योदय के कुछ पल बाद 
वसंत के आगमन की आहटें सुनाती 
यह 
मद्धम सी रहस्यमय, पारदर्शी चादर 
सहसा 
अपने में समा कर मुझे 
एक 
अनिर्वचनीय सौन्दर्य का 
हिस्सा बनाती 
कहीं न कहीं 
यह 
प्रश्न भी छोड़ जाती 
मैं क्या अंश हूँ उसी का 
जिसे खो जाना है 
 
फिर क्यूं लगता है 
 कुछ ऐसा भी है मुझमें 
जिसे न खोना है न पाना है 
 
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क,  अमेरिका 
१ ९  अप्रैल २ ० १ ३ 

Saturday, April 13, 2013

शब्द महल




शब्द महल में सांस सजाई 
सारे जग की दौलत पाई 
सुन्दरता के रूप नित नए 
अक्षय आनंद की अंगड़ाई 
पथ पर किसका हुआ बसेरा 
कुछ दूरी का तेरा-मेरा 
शब्दालोक जगा कर देखा 
लुप्त हो गया  घेरा 

आपा धापी दूर हटाई 
शांत सुधा ऐसे बह आई 
रोम रोम ने शुद्ध प्रेम से 
शाश्वत जी की महिमा गाई 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
१ ३ अप्रैल २ ० १ ३  
 

Wednesday, April 10, 2013

नयी कविता की खोज करने



अब उसके पास 
एक और प्रमाण पत्र था 
नदी का 

कल कल बहती नदी ने  
रुक कर 
एक क्षण 
व्यक्त किया 
अपना आनंद 
और  
घोषित कर दिया उसे
" कवि"
 
 
२ 
 
नदी और पर्वत के 
प्रमाण पत्र लिए 
इस बार 
आकाश की तरफ देख कर 
पूछ उसने 
इन प्रशस्ति पत्रों के बदले 
कैसे 
धन-संपत्ति पाऊँ 
कैसे 
वैभवशाली बन जाऊं ?
 
 
 
३ 

हवा ने आकर 
छीन लिए 
सारे प्रमाण-पत्र 
मांगने की फितरत ने 
इस बार 
उसे 
नंगा कर दिया था 
इस तरह की 
अपनी लाज छुपाने 
 
चल पडा वह 
नयी कविता की खोज करने 
वन की ओर
 

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
१ अप्रैल २०१ ३  
 
 

Monday, April 8, 2013

थपथपाता हूँ धरती



होते होते 
उतर आता है 
फिर वही ठहराव 
दीखते हुए भी नहीं दिखाई देता कुछ भी 
क्या 
कैसा रास्ता 
कहाँ गंतव्य 
न कुछ सूझता 
न किसी का संकेत सुनाई देता 
ठहरे ठहरे 
गतिमान होने का स्वांग 
भरते भरते 
भी 
यह 
जो थकान सी उतर आई है 
अब इसके सत्कार में 
बीत रहा है समय 
 
ठहराव का साथ देना 
सीखा ही नहीं समय ने 
फिर से उठ कर 
थपथपाता हूँ धरती 
शायद 
माँ के भीतर से ही 
फूट पड़े पुकार 
पथ दिखलाने 
स्वयं प्रकट हो जाएँ 
पग डंडियाँ 
 
छूट जाने ठहराव से 
गति को बुलावा भेजने 
इस बार 
कुछ नया ढंग अपना लेने 
उतर पडा हूँ अपने ही भीतर 
बचते बचाते 
उस बिंदु से 
जहां 
एक जान पड़ते हैं 
गति और स्थिरता 
 
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
अप्रैल  

Sunday, April 7, 2013

सीमातीत का गीत

 
१ 
बिना सोचे लिखते हुए 
शब्द रश्मियाँ 
दिखला देतीं 
दिशाएं सोच की 

अनाम पगडंडियों पर 
भागती है 
छाया जिसकी 
वह मेरा क्या लगता है 

सवाल निराकार 
फुदकते मेमने से 
ऊंची पहाडी पर 
छलांग लगाते 
आँखों से ओझल हो जाते 

२ 

बिना सोचे 
मैंने जाना है 
सोचना समाधान तक 
नहीं ले जाता हमेशा 
कई बार 
समस्या से छूटने का आग्रह छोड़ कर भी 
छूट जाता है 
एक कुछ 
बेचैन करता हुआ 
मुक्ति 
कुछ से कुछ होने में नहीं 
जो है 
उसे देखने, अपनाने 
और 
सोच से रहित 
सीमातीत का गीत 
गुनगुनाने में है 

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
७ अप्रैल २ ३ 

Tuesday, April 2, 2013

अपनी पूर्ण पहचान के लिए


इस बार 
हो गयी उसकी करारी हार 
किनारे पर 
छूट गयी थी पतवार 
सहसा प्रश्न पूछने 
लगी मंझधार 
डूब ही जाओ ना 
क्या धरा है उस पार 

२ 
यहाँ उसे लगा 
धारा के अपनेपन में छल है 
बीच धार जो डूबा 
वो तो आँख से ओझल है 
सहसा समझा आया उसे 
बिना धरा के 
ना तो उसका आज है 
न उसका कल है 
३ 
फिर प्रेमसहित 
धारा से कहा उसने 
प्रस्ताव फिर कभी करूंगा स्वीकार 
आज तो चल निकलना है 
बना कर 
बाहों से पतवार 
किनारे पर 
छूट गया मुझसे 
अपने होने का सार 
अपनी पूर्ण पहचान के लिए 
जाना ही होगा 
मुझे उस पार 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
२ अप्रैल २० १ ३

Monday, April 1, 2013

जोड़-गणित

 
 
कभी कविता लिखना 
ऐसे था 
जैसे सांस लेना 
और 
अभी 
तैरते तैरते 
कविता की और 
ज्यों ज्यों 
हाथ बढाता हूँ 
कविता को अपने से 
दूर 
और दूर 
खिसकते हुए पाता हूँ 
जोड़-गणित 
साथ लगा है 
तैरते हुए भी 
कविता को अपने ईमानदार होने की खबर 
पहुँचाने में 
सफल नहीं हो पाता हूँ 

२ 
ये 
जो जोड़- गणित है 
दरअसल 
बही खाता सा है 
खोने पाने का 
संतोष के लिए 
नए नए बहाने 
बनाने का 

इसके चक्कर में उलझ उलझ कर
 दिखाई नहीं देता
 इस सारे खेल में सचमुच 
न तो कुछ आने का 
ना ही कुछ जाने का 


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
१ अप्रैल २० १ ३ 

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...