Wednesday, April 10, 2013

नयी कविता की खोज करने



अब उसके पास 
एक और प्रमाण पत्र था 
नदी का 

कल कल बहती नदी ने  
रुक कर 
एक क्षण 
व्यक्त किया 
अपना आनंद 
और  
घोषित कर दिया उसे
" कवि"
 
 
२ 
 
नदी और पर्वत के 
प्रमाण पत्र लिए 
इस बार 
आकाश की तरफ देख कर 
पूछ उसने 
इन प्रशस्ति पत्रों के बदले 
कैसे 
धन-संपत्ति पाऊँ 
कैसे 
वैभवशाली बन जाऊं ?
 
 
 
३ 

हवा ने आकर 
छीन लिए 
सारे प्रमाण-पत्र 
मांगने की फितरत ने 
इस बार 
उसे 
नंगा कर दिया था 
इस तरह की 
अपनी लाज छुपाने 
 
चल पडा वह 
नयी कविता की खोज करने 
वन की ओर
 

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
१ अप्रैल २०१ ३  
 
 

2 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

मूढ़ बने हम, जो कविता का मोल लगाने बैठ गये,
ठेठ भाव थे, शब्दों का श्रृंगार सजाने बैठ गये।

महेन्द्र श्रीवास्तव said...

बहुत सुंदर
क्या कहने

वहाँ जो मौन है सुंदर

वह जो लिखता लिखाता है कहाँ से हमारे भीतर आता है कभी अपना चेहरा बनाता कभी अपना चेहरा छुपाता है वह जो है शक्ति प्रदाता  ...