Saturday, April 13, 2013

शब्द महल




शब्द महल में सांस सजाई 
सारे जग की दौलत पाई 
सुन्दरता के रूप नित नए 
अक्षय आनंद की अंगड़ाई 
पथ पर किसका हुआ बसेरा 
कुछ दूरी का तेरा-मेरा 
शब्दालोक जगा कर देखा 
लुप्त हो गया  घेरा 

आपा धापी दूर हटाई 
शांत सुधा ऐसे बह आई 
रोम रोम ने शुद्ध प्रेम से 
शाश्वत जी की महिमा गाई 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
१ ३ अप्रैल २ ० १ ३  
 

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

सुख बस प्रेम में व्यापा..

वहाँ जो मौन है सुंदर

वह जो लिखता लिखाता है कहाँ से हमारे भीतर आता है कभी अपना चेहरा बनाता कभी अपना चेहरा छुपाता है वह जो है शक्ति प्रदाता  ...