Tuesday, September 17, 2013

उसकी खातिर ये सांस का मेला

 
लौटते हुए अपने घर से 
इस बार 
जब उसने देखा 
बाहें फैला कर बुलाता हुआ आसमान 
 
उसे लगा 
खुल गयी सब गांठें 
एक नन्हे से क्षण में 
सहसा, सब कुछ हो गया आसान 

२ 

दूर तक 
एक उसका साया है 
जिसने अपना 
हमें बनाया है 
उसकी खातिर ये 
सांस का मेला 
वो भी साँसों के 
साथ आया है 
 
३ 
तेरे नाम के गीतों से सब काम चलाया करता हूँ 
तेरे दर ले कर आते रास्तों पे जाया करता हूँ

मैं खोया खोया होता हूँ बहकी बहकी बातों में 
पर तेरी पहचान लिए मंजिल तक आया करता हूँ 


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
१७ सितम्बर २०१३



 
 

2 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

जो अनन्त, हैं अंग तुम्हारे

मदन मोहन सक्सेना said...

बहुत सुंदर ! जितनी सार्थक रचना उतनी ही कलात्मक ! शुभकामनायें !
कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
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