Friday, September 13, 2013

....पर प्यार है तुमसे

 
 
इस बार 
कोइ रचनात्मकता की बरखा नहीं 
न ही 
अपने सत्यान्वेषी होने का भ्रम 
इस बार 
उसे नहीं करना था 
किसी सुन्दर गलियारे में प्रवेश कर 
अनदेखे को देखने का श्रम 

इस बार 
उसने कविता को सिर्फ समय बिताने के लिए बुलाया 
और अपना मंतव्य भी 
कविता को साफ़ साफ़ शब्दों में बताया 

इस बार 
न वो मुस्कुराया, न उसने कोइ संकल्प गीत गाया 
और कुछ हो न हो 
पर प्यार  है तुमसे, कविता के साथ बैठ, ज़िन्दगी को ये बताया 
 
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
१३ सितम्बर २०१३

वहाँ जो मौन है सुंदर

वह जो लिखता लिखाता है कहाँ से हमारे भीतर आता है कभी अपना चेहरा बनाता कभी अपना चेहरा छुपाता है वह जो है शक्ति प्रदाता  ...