Friday, July 5, 2013

भय प्रदेश की भूल भुल्लैया


तो चलते चलते 
अदृश्य हो जाता है 
रथ का सारथि जब 
एक अज्ञात भाव घेर लेता है 
कहीं छूट तो न जायेगी दिशा 
कहीं सरपट भागते पहिये पथच्युत तो न हो जायेंगे 
 और 
किसी अनजानी चोट के काल्पनिक स्पर्श से सहम कर 
व्याकुलता की पगडंडियों पर 
दौड़-धूप कर 
प्रार्थना के निमित्त 
बंद कर आँखें 
किसी आश्वस्त पवन की थपकी से 
आंख खोल कर देखता हूँ 
वहीँ है सारथि 
वैसे ही 
अश्वों की रास थामे 
पलट कर 
मेरी और मुस्कुराते हुए 
मेरी आँखों में टंगे प्रश्न 
'कहाँ चले गए थे' का 
आँखों से ही जवाब देता है 
कहता है 
"मैं तो यहीं था 
तुम ही चले गए थे 
सैर करने
अपने भय प्रदेश की भूल भुल्लैया में


अशोक व्यास 
५ जुलाई २ ३

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

जीवन को न जाने किस राह पर लिये जा रहा है विधाता, नियति के रथ पर।

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...