Wednesday, May 29, 2013

विराट का उल्लास


अपने हाथ बाँध कर 
देखता हूँ 
बंधता नहीं 
मेरा खुलापन 

मुक्त पवन 
सांसों में 
गाती है 
विराट का उल्लास 

बंधन वहां है 
जहां अपूर्णता है 

सुन कर तुमसे 
अपनी पूर्णता का गान 
अब 
रमा हुआ आपने आप में 

देखता हूँ 
है इतना अवकाश मुझमें 
की सहेज लूं 
एक दो नहीं 
अनंत सम्बन्ध सेतु 
 
यह अक्षय प्रीत का गौरव 
खिला है 
मेरे भीतर 
तुम्हारे अनुगृह से 
इस  तरह की 
अनायास ही
समझ में आने लगा है 
अर्थ वसुधैव कुटुम्बकम का 
 
 
अशोक  व्यास 
न्यूयार्क अमेरिका 
२९ मई २० १ ३
 
 

6 comments:

abhishek said...

अतीव सुंदर

abhishek said...
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abhishek said...
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महेन्द्र श्रीवास्तव said...

बढिया
बहुत सुंदर

Anupama Tripathi said...

बंधन वहां है

जहां अपूर्णता है




सुन कर तुमसे

अपनी पूर्णता का गान

अब

रमा हुआ आपने आप में


gyanvardhak ....man kendrit karti hui ....!!
bahut sundar rachna ....!!

प्रवीण पाण्डेय said...

सारा जग, एक विराट का अंश, अपना लगता है।

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...