Saturday, March 9, 2013

दौड़ते दौड़ते


जैसे दौड़ता है नन्हा बच्चा 
कमरे में 
इधर से उधर 
उधर से इधर बेमतलब 
बस 
उत्सव मनाता 
इस बात का 
की उसने 
चलने के साथ साथ 
सीख लिया है 
अब 
दौड़ लेना भी 
और 
सीखे हुए का अभ्यास करने की क्रिया पर 
मतलब की मांग आरोपित कर देना 
सीखा नहीं उसने अब तक 
 
ऐसे ही 
लिखता हूँ 
शब्दों की अंगुली थाम कर 
इस दिशा से उस दिशा तक 
उस दिशा से इस दिशा तक 
ढूंढते हुए 
एक उभयनिष्ठ तारतम्य 
किसी अनाम क्षण में 
खुल जाती है 
मुझ पर 
समग्रता सृष्टि की 
यूं ही 
खेल खेल में 
पर 
दौड़ जो है यह 
अभिव्यक्ति की 
अभ्यास मात्र है 
अपने होने की क्रिया का 
उत्सव मनाते हुए 
उमड़ आता है 
जो आनंद सहज ही 
इसे लेकर बैठ नहीं जाना है 
दौड़ना है और 
दौड़ते दौड़ते 
तुम तक आना है 
इस परिपूर्णता के स्पर्श से 
हर दिशा को छू जाना है 
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क,  अमेरिका 
९ मार्च २ ३ 

2 comments:

Anupama Tripathi said...

अथक प्रयास ही है जीवन ......!!
बहुत सुन्दर भाव .......

प्रवीण पाण्डेय said...

बच्चों का आनन्द माँ को भाता है।

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...