Wednesday, March 13, 2013

ये साँसों की श्रंखला



हर बार 
इसी तरह 
एक अंदरूनी परत 
अनछुई 
परे स्पर्श के 
रह रह कर 
अपने होने का बोध जगाती 
समझ से परे होकर भी 
ना जाने 
किस रास्ते से आकर 
समझ पर 
छा जाती 
 
 
२ 
 
किस का है हम पर अधिकार 
हम हैं कौन आखिरकार 
कभी संबंधों में ढूंढते सार 
कभी चले जाते संबंधों के पार 
 
३ 
जीवन एक पहेली 
एक यात्रा 
सबका साझा 
एकदम एकाकी 
 
है क्या आखिर?
 
ये  साँसों की श्रंखला 
 
कभी 
 फुर्सत के क्षणों में 
इस और ध्यान जाता है 
या शायद 
जब इस तरफ ध्यान जाता है 
फुर्सत अपने आप आ जाती है 
 
४ 
 
अक्सर 
जिसे हम देख-छू पाते हैं 
उसे ही 
मानते हैं सत्य 
और कभी 
यह स्पष्ट हो जाता है 
 
की सत्य यदि 
हमारे देखने सुनने जानने तक ही 
सीमित हो जाता 
                                                                 तो हमारी सीमितता में 
सत्य अपनी सत्यता को 
खो जाता 
 
अशोक व्यास 
 
न्यूयार्क, अमेरिका 
१ मार्च २० १ ३ 
 

2 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

एक से जुड़कर दूसरी और बढ़ती जाती यह श्रंखला..

Anupama Tripathi said...

कभी
फुर्सत के क्षणों में
इस और ध्यान जाता है
या शायद
जब इस तरफ ध्यान जाता है
फुर्सत अपने आप आ जाती है

sundar abhivyakti ....

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