इस बार
वो डरते डरते
प्रविष्ट हुआ
कविता के गलियारे में
जैसे
स्वयं से बिछुड़ने की पीड़ा
कोइ पाप हो
और उसके साथ में
इस अवगुंठन
का श्राप हो
इस बार
वह
सब से सब कुछ छुपा कर
सहज बने रहने का स्वांग
सजा कर मुख पर
निकल आना चाहता था
सधे हुए कदमो से
सत्य की महिमा से मंडित
इस
गोपनीय गलियारे से
अपने चेहरे पर
समाधान युक्त होने का क्रीम लगाकर
इस बार
वो नहीं चाहता था
सारी जेबें
खंगाल कर
देखना और दिखाना
की
अब भी
कंकर ही जमा हैं
कामनाओं की आहटों में
वही उदास गीत गूँज उठता है
अब भी
उसकी अंगुलियाँ
अपनी जेब में
कोइ सुनहरी सुबह
टटोल टटोल कर
थकी नहीं हैं
पर
कुछ है
जो थक गया है
कुछ है
जो ये सब खेल छोड़ कर भाग जाना चाहता है
अर्थ की और ले जाते कदम
अब थक कर
सुस्ताना चाहते हैं
कह कर
अपना सत्य
उसे मालूम था
कविता की गोद में सर रख कर
रो पड़ेगा वह
और
दिखलाते हुए अनाम अकेलापन
हँसना पड़ेगा उसे भी
अपने आंसूं के साथ
क्योंकि वह
जो दिखाया जाना है
दीखता नहीं
महसूस भर किया जा सकता है
और
कैसे कहे कविता को की
अपनी पीड़ा को महसूस करने वाला इंसान
और कोइ बनाया ही नहीं बनाने वाले ने
सब अपना अपना भुगतते हैं
अपनी अपनी ढफली लेकर अपना अपना राग गाते हैं
अब उसे
यह भी कहना पडा कविता को
की नहीं जान पाया वह
किसी के दर्द को अपनाना
सीख ही नहीं पाया
अपने दर्द से बाहर आना
और
ना जाने यह कैसा दर्द है
जो संभव नहीं
किसी को दिखाना
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१ मार्च २ ३

1 comment:
मन में जो फँसा है, जब तक वह बाहर नहीं आयेगा, सहजता कहाँ से आयेगी?
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