Sunday, March 10, 2013

जब छोड़ दिया अपना पहनावा ...


वह 
जब जहाँ जैसे भी जिया 
उसका हिस्सा 
कई कई रूपों में 
धडकता रहा 
उससे परे 
उसकी छाँव में 
अपनी स्वतंत्रता सहेजता हुआ 
क्योंकि 
यही तो चाहता था वह 
की उसकी सन्तति 
स्व-निर्भर होकर 
सृजित करे 
संतोष का संगीत 
सेवा उसके लिए 
सहज  विस्तार था 
अपने होने का 

ना किसी मंच से 
अपने  इंसान होनी की प्रदर्शनी की  उसने 
न किसी से 
विशेष प्रोत्साहन की आशा ही 

उसका जीवन 
कितना सामान्य था 
यूं तो 
पर उसकी सादगी में 
छल-छल बहती थी प्रीत 
 
ना जाने 
संस्कृति की गहराई का 
एक बरगद सा 
पनपता गया 
अपने आप 

उसने ईमानदारी, निष्ठा
और 
संवेदना के साथ 
श्रम के सधे हुए सोपान चढ़ते चढ़ते 
एक दिन 
थक कर 
जब 
छोड़ दिया 
अपना पहनावा 
 
बिलख पड़े हम 
सिसकियों में 
सुनते रहे 
सागर की आहटें 
 
लहर ना जाने कैसे 
चुपचाप 
अपने साथ 
ले जाकर लीन कर लेती है 
 हमें 
 जिस क्षण 
 
यात्रा का विराम हो जाता है वैसे तो 
पर 
आत्मीय सौन्दर्य का 
विस्तार 
सूर्य किरणों के प्रसरण सा 
प्रखर आभा के साथ 
एकाएक 
कितने दिलों में 
खिल जाता है 
शाश्वत स्फूर्ति की अंगड़ाई लेकर 
 
प्रेरणा शब्दों में नहीं 
पांवों में होती है 
प्रणाम के साथ 
प्रेम और जाने-अनजाने हुई त्रुटियों के लिए क्षमा याचना 
और हमारी आपसी पहचान के 
एक अनूठे सेतु पर 
यह भावयुक्त पुष्प
प्रार्थना के साथ  

 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
१ मार्च २ ३  
 

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

आधुनिकता के प्रवाह में कहीं संस्कृति के प्रवाह बह न जायें।

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...