Friday, April 20, 2012

पूर्णता का प्रवाह



यह जो 
अनायास प्रकटन है
उजियारे सौंदर्य का
धूप की तुलिका 
रच देती है
कहीं पत्तियों, कहीं भवनों की आकृति पर
एक नूतन संयोजन
अव्यक्त आनंद का

इसे सहेजना है यदि
तो
जाग्रत होना है
इस क्षण
चित्र चेतना पटल पर
शाश्वत की 
स्निग्ध, कोमल मुस्कान का
ठहरा है जो
इस क्षण,
इसी में पूर्णता है

कहते हैं
प्रसन्नता से खिल कर गुरु
'नित्य जाग्रत रह कर
तुम अपने जीवन को
पूर्णता का प्रवाह बनाओ ना!' 
फिर अपने मौन में 
सोच रहे हैं शायद
"पूर्णता नित्य-संगिनी है
पर जाग्रत रहे बिना
इसे न कोई जान पाए
न अपनाए'

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२० अप्रैल २०१२            

   

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

पूर्णता का हर पल जगमगाता है।

वहाँ जो मौन है सुंदर

वह जो लिखता लिखाता है कहाँ से हमारे भीतर आता है कभी अपना चेहरा बनाता कभी अपना चेहरा छुपाता है वह जो है शक्ति प्रदाता  ...