Wednesday, April 18, 2012

मेरी मूढ़ता या तुम्हारी शरारत


वहां से यहाँ तक की यात्रा में
सब कुछ किया तो तुमने ही
केशव
मेरे उत्थान-पतन की लहरों का
साक्षी भर रहा मैं
और
जब जब 
स्वयं को देखते हुए
देख पाया तुम्हारे होने का
यह भाव
जिससे तुम्हारा होना
प्रकट होता रहा मुझ पर

कभी पत्तियों की ओट में छुप कर
मंद मंद मुस्कान के साथ
अधरों पर बंशी धर
एक मंगल-तान से
छिन्न-भिन्न कर दिया तुमने
मेरा
तनाव रचती प्रक्रिया को

कभी
यूँ ही
उँडेल कर मुझ पर
समग्रता का सौन्दर्य
हँसते हँसते
विलीन हो गए तुम नील गगन में

ओ विराट सखा
यह जान कर भी की
तुम्हारे समीप होने का भाव ही
पूंजी है मेरी
इस भाव की सुरक्षा के प्रति
इतना असावधान कैसे रह जाता हूँ मैं
ये मेरी मूढ़ता है
या तुम्हारी शरारत


अशोक व्यास
१८ अप्रैल २०१२
            बुधवार                      

2 comments:

वन्दना said...

ओ विराट सखा
यह जान कर भी की
तुम्हारे समीप होने का भाव ही
पूंजी है मेरी
इस भाव की सुरक्षा के प्रति
इतना असावधान कैसे रह जाता हूँ मैं
ये मेरी मूढ़ता है
या तुम्हारी शरारत

अशोक जी यही तो उसकी लीला है पल मे भुलावा दे देता है

प्रवीण पाण्डेय said...

लीलाधारी से और क्या आशा कर सकते हैं।

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