Monday, March 12, 2012

बिना किसी अपेक्षा के


उस दिन 
सूरज ने सपने में आकर
पूछ लिया प्रश्न
मैं अपनी किरणें भेज कर
उजियारा करता हूँ
तुम्हारा पथ
निकाल देता हूँ
अँधेरे में डूबा तुम्हारा सारा संसार
ताकि
तुम जुड़ सको सबसे
इसके बदले में
मुझे क्या दोगे आज तुम
सपने में भी
असहमति व्यक्त करते हुए
कहा था मैं ने 
सूरज से
'ये मनुष्य की तरह 
लेन-देन की बातें
आपको शोभा नहीं देती
आपका काम है देना
बस देते रहें'
सूरज मुस्कुराये
'मैं 
बस देता रहूँ
बदले में कुछ न मांगू
ठीक है!
और तुम?"
सूरज के इस प्रश्न के साथ ही
मैं
नींद से जागा
खिड़की से
सूरज के आगमन के संकेत
घर में
उजियारा बिखेर रहे थे
बिना किसी अपेक्षा के
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१२ मार्च २०१२                        

3 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

हमने अपने संसार को अँधेरे में डुबा रखा हुआ है और सूर्य से आशा करते हैं कि वह हमारा भला करता रहेगा।

sunil purohit said...

न समझा जब तक कि सूरज मेरा भी है
अंधेरों से घबरा भटकता ही रहा तब तक
अपेक्षाओं का अम्बार लिए रहा जब तक
अधूरा ही अपने को समझ रहा अब तक

मनीष सिंह निराला said...

सुन्दर प्रस्तुति !
आभार !

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