Saturday, December 24, 2011

पग पग उसका ही सत्कार

 
रसमय
तन्मय
चिन्मय मन
रमे राम में
निर्भय मन
अमृत धार
निमग्न हुआ जग
तुझमें घुल कर
अद्वय मन
 
 
आनंद के सुर ताल उजागर करता है
परम शांति का सार दिवाकर भरता है
किरण किरण में उसी छटा के दरसन है
पग पग जिसका सुमिरन किये संवरता है
 
 
 
बात पहुँची परदे के पार
प्राप्य पा गयी पुकार
द्वार-द्वार जो मुस्काए है
पग पग उसका ही सत्कार
 
 
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२४ दिसंबर २०११   
 
            

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

हर तरंग उस सुख सागर की।

वहाँ जो मौन है सुंदर

वह जो लिखता लिखाता है कहाँ से हमारे भीतर आता है कभी अपना चेहरा बनाता कभी अपना चेहरा छुपाता है वह जो है शक्ति प्रदाता  ...