Sunday, December 25, 2011

जिसका नाम कृष्ण है

 
उस दिन
पेड़ की खोह में
धर कर पोटली कविता की
उतरा था
नदी में जब
नहीं जानता था
लौटते हुए
हर सांस में
प्रस्फुटित हो जायेगी कविता
और
भूल कर पेड़ की खोह में छुपी कविता
वह
पेड़ों की शाखाओं को
करने लगेगा अलंकृत
चिरजीवी कविताओं के उजियारे से
 
अब ऐसा सृजनशील वन हो गया है
उसका मन
जहाँ वृन्दावन के पवन के हर झोंके से
अगणित कवितायेँ दिखाई देती हैं
 
और
इन सब कविताओं के बीच
आज भी 
रास रचाता है
वह काव्य पुरुष
जिसका नाम कृष्ण है
 
 
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२५ दिसंबर २०११          
      

1 comment:

वन्दना said...

और
इन सब कविताओं के बीच
आज भी
रास रचाता है
वह काव्य पुरुष
जिसका नाम कृष्ण है
यही तो उसकी लीला है :):)

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...