Friday, December 23, 2011

जो दरअसल खेलता वही है

ठहरते ठहरते भी
वह न जाने कैसे
कर लेता था
सारी दुनियां की सैर
जानता था
प्रकट-अप्रकट सन्दर्भ इतने सारे
पर
छलकता नहीं था कभी
अनंत सा घड़ा उसके ज्ञान का
सहज
पग पग पर
मगन किसी अदृश्य  लोक में
वह उतना ही कभी भी नहीं था
जितना दीखता था
काल और भौगोलिक सीमाओं से परे
हर मौसम में
वह अब भी
दिख जाता है  
आत्म-सखा की तरह
अमोघ आश्वस्ति और
अदम्य उत्साह का उपहार सौंप कर
जैसे बैठ कर
दर्शक दीर्घ में
देखने लगता है
खेल

जो दरअसल खेलता वही है
वो, जो उतना ही कभी नहीं रहा
जितना दीखता था
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२३ दिसंबर २०११            

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

सब उसकी ही माया साधो...

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...