Monday, December 19, 2011

बढ़ता जाए है तुमसे लगाव

मुग्ध
तुम्हारे खेल पर
हंस हंस कर
देखता हूँ अपने घाव
चोट 
जहाँ भी लगे
बढ़ता जाए है
तुमसे लगाव
 
 
उसके आने पर
इतनी रौनक लगी
 इक्कट्ठे हो गए लोग
इतने सारे,
पर मैं उसे
देख ही ना पाया
अपनी छोटी- छोटी 
उलझनों के मारे
 
 
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१९ दिसंबर २०११    
 

   
     
          

4 comments:

संतोष कुमार said...

Sunder kshanikayen..

Aabhaar..!

Rakesh Kumar said...

बढ़ता जाए है तुमसे लगाव

आपकी भक्ति में है ऐसा ताव
प्रस्तुत करते हैं अति उच्च भाव
प्रभु के नाम की लेकर नाव
आप पहुँचा ही देंगें अपने गावँ
परम धाम ही है सबका ठांव

बहुत बहुत आभार ,अशोक भाई.

अरूण साथी said...

सारगर्भित..

Ruchi Jain said...

The first one is awesome... very nice poems..:)

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