Sunday, December 18, 2011

अनुपम उपहार

ठीक समय पर
घंटी बजा कर
हर दिन
अपनी ओर से
लगा कर पुकार,
करने लगता हूँ
उससे मिलने
तरह तरह के
कर्म का श्रृंगार,
 
 
 
लगता यूं है इस बार
वो आ ही गया आखिरकार
पर छुप्पा छुप्पी के खेल से
सिखा रहा है अगोचर सार
 
 


नहीं दिखती दर्पण में
प्रसन्नता की ये उजियारी धार 
अंतस में धर गया है वो
जिसका अनुपम उपहार
 
 
 
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१८ दिसंबर २०११   



                

2 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

कर्म सृष्टि खेल का नियत अंग है।

अरूण साथी said...

साधु-साधु

कविता

कविता न नारा न विज्ञापन कविता सत्य खोजता मेरा मन कविता न दर्शन न प्रदर्शन कविता अनंत से खेलता बचपन कव...