Tuesday, December 6, 2011

बदलाव का छल



यह
जो अनदेखे स्थल में
संचरित हो सकता है
बोध उसकी उपस्थिति का
इस धारा को आवाहित कर
जाग्रत कर पाने की आश्वस्ति
जब 
अभ्यास और कृपा से
अपने भीतर
संभल जाती है
यूं लगता है
दुनिया बदल जाती है
 २
सचमुच होता ये है
कि
मन में उतरता है निरंतर
अनवरत आनंद का ऐसा स्थल 
कि 
हमें छेड़ नहीं पाता फिर
किसी भी बदलाव का छल
इस भाव धारा
को लिखा-पढी से
नहीं कर सकता कोई किसी के नाम
जगाना होता है इसे
कभी शब्द सहेज कर
कभी गुरु के मौन को थाम
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
६ दिसंबर २011   


1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

मन की आदत है बदलाव।

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