Monday, August 15, 2011

प्राणदाता का अनुग्रह स्पर्श






 
धीरे धीरे लौट आया फिर
अपने आप में मैं
 
मिट गया खोखलापन
लुप्त हुआ अपरिचय का भाव
छूकर
मेरे सब इन्द्रियों को भीतर से
किसी ने
 जगा दी आश्वस्त करती
नूतन जगमगाहट   

 
 धीरे धीरे
  फिर मुखरित हुआ
 जीने का आनंद
झंकृत हुए
उमंगों के स्वर
लहराई चाह
 कुछ ऐसा करने की   
कि अभिव्यक्त हो
मेरा सबसे जुड़ाव
 
  लो पेड़, बादल, पंछियों की बोली के साथ
  फिर करने लगी
मेरी धडकनें मौन संवाद
 
   फिर से महसूस हो रहा है
 मेरी शुभ कामनाओं में
 तुम्हारी स्फूर्ति है
  मेरे प्राणों को
     पूर्णता की माधुरी से
  भर रहा है
 प्राणदाता का अनुग्रह स्पर्श
 
अशोक व्यास
१५ अगस्त २०११ 
न्यूयार्क, अमेरिका  

2 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

उस स्पर्श की प्रतीक्षा।

सूर्यकान्त गुप्ता said...

भावपूर्ण रचना……आभार।

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