Tuesday, August 16, 2011

तलाश किसकी है



तेल की धारा जैसे
बहता ही नहीं 
ध्यान उसका

टूटता है
 जुड़ता है  
 फिर टूट जाता है

और इस युग्म के बीच 
मुझसे मेरा परिचय
  छूट जाता है


  परिचय छूट जाने से 
 बदल जाती है भूमिका 
बदलती गति की दिशा, गंतव्य का पता 

 अपरिचित स्वयं से
 अपने ही नगर में
 भटक जाता 

 ढूंढता रहता है कुछ
 ये जाने बिना कि
 तलाश किसकी है 

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१६ अगस्त २०११  

2 comments:

वन्दना said...

हम सब जीवो की यही दशा है एक तलाश मे निकले है मगर खुद ही भ्रमित हो जाते हैं।

प्रवीण पाण्डेय said...

उस अपरिचित की खोज में हम सब लगे हैं।

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