Wednesday, August 17, 2011

सर्वकालिक होकर



सहसा
उसने फेंक दी
कई सारी पुरानी किताबें
शब्दों में छुप कर घात लगाते अतीत से मुक्त
इस बार
जब वो देखने लगा आस्मां
 उड़ गए थे सपनो से   
 कुछ रंग


 सहसा  
  भूत और भविष्य से मुक्त होकर
 वर्तमान का आलिंगन करने
बढ़ाते हुए बाहें
 सूरज से मिल गयी उसकी आँख

  वर्तमान ने आत्मीयता से
 अपनाते हुए उसे
 कह दिया फुसफुसा कर 
  मुझ ही में समाया है
बीता हुआ
 और आने वाला कल
पर दिखता सिर्फ मैं हूँ
 क्योंकि
तात्कालिक बन कर मिलते हो मुझसे 
 मिलो कभी सर्वकालिक होकर 
तो समझ पाओगे
 तुमसे अलग नहीं हूँ 
  मैं कभी


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१७ अगस्त 2011 

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

तात्कालिक और सार्वकालिक भावों में छिपा हमारा जीवन।

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