Saturday, August 13, 2011

विस्तृत चेतना का आलिंगन


आज 
देख रहा हूँ 
 कितनी दुरूह है  
तुम्हारी कविता
 ये मेरा जीवन 

इतनी सारी परतें
इतने सारे आयाम
इतना विस्तार देकर भी
नहीं बताया तुमने
कैसे करूँ
     इस विस्तृत चेतना का आलिंगन 

   आज लग रहा हूँ
  जो कुछ छुपाया है तुमने
वो शायद इसलिए की
हर दिन करता रहूँ
मैं अपना आविष्कार
 और इस तरह
  हर दिन मिलता रहे
 नया नया उपहार



  तुम से ही है
प्यार, सार
रसधार,
 अपने
जन्मदिन पर
तुम्हें प्रणाम, तुम्हारा आभार


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१३ अगस्त २०११   
 

3 comments:

Rakesh Kumar said...

तुम से ही है
प्यार, सार
रसधार,
अपने
जन्मदिन पर
तुम्हें प्रणाम, तुम्हारा आभार

अरे वाह! अशोक भाई.
आपका जन्म दिन
और आज ही रक्षाबन्धन
का शुभ दिन.
प्रभु ने क्या सुन्दर तोहफा दिया है.
लगता है प्रभु को राखी बाँध कर ही आयें है आप.
आपको शत शत बधाई और शुभकामनाएँ.
रक्षाबन्धन और स्वतंत्रता दिवस की भी हार्दिक शुभकामनाएँ.

मेरा ब्लॉग भी आपके दर्शन को व्याकुल है.

प्रवीण पाण्डेय said...

जन्मदिन की बधाई, चेतना बस खुलती जाये।

अनुपमा त्रिपाठी... said...

हर दिन करता रहूँ
मैं अपना आविष्कार
सुंदर विचार....
जन्मदिन की शुभकामनायें.

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