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(चित्र - विशाल व्यास, जोधपुर में एक पोल, --- तब जब बड़े बड़े थे द्वार, कितना था दिलों का विस्तार) |
पीड़ा का पनघट था
जहाँ
कल तक
आज उग आई हैं
प्यार की कोपलें वहां
शायद
न पीड़ा सत्य है न प्यार
शायद
झूठ है
यह बंधन भी
जो कभी हमें पीड़ा से
कभी प्यार से एकमेक करता है
शायद सत्य तो हमारा नित्यमुक्त होना है
जिसे झुठलाने
किसी न किसी पीड़ा
या किसी प्यार के सन्दर्भ से
बंधे होने का खेल
करते रहते हैं हम
ताकि बनी रहे
हमारे लिए हमारी परिचित सी
सीमित पहचान
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१२ अगस्त २०११
1 comment:
प्रेम ही पीड़ा की औषधि है।
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