Friday, February 25, 2011

अस्तित्व दीवारों का


ये किसकी व्यवस्था  है
की
बाहर रहता है सूरज
और
सारे जगत में 
फैलते उजियारे से परे 
अपने बंद कमरे के अँधेरे में
रह सकते हैं हम

ये किसका निर्णय है
की बंद रहें खिड़कियाँ-दरवाजे
कट कर
बाहर की हवा से
अपने आप में सिमटे
दोहराते रहें हम
वो कुछ बातें
जिनके गंध
बैचैन करती है हमें

ये कौन है
जो उठा कर हमारे हाथ
खुलवा देता है
हमारे ही घर की खिड़कियाँ
और
बादलों के नयी कलाकृति
का पारदर्शी संगीत
अनायास
कुछ नया रच देता है
हमारे भीतर 
ऐसा
की मिटने लगता है
अस्तित्व दीवारों का


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
                  शुक्रवार, २५ फरवरी २011             

3 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आज की जीवन शैली पर लिखी अच्छी रचनाएँ

प्रवीण पाण्डेय said...

अपने और प्रकृति के बीच निर्मित कृत्रिम बाधायें।

Ashok Vyas said...

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