Thursday, February 24, 2011

जितना बहुमूल्य है जीवन





कविता को नहीं
स्वयं को पकड़ता हूँ
किसी नए कोण से
पहुँचता हूँ अपने तक
किसी नए द्वार से

विस्मय का 
एक रोशन सूराख
दिखलाता है
मेरे कुछ अनदेखे हिस्से मुझे

पहचान की एक नयी सीढ़ी पर
चढ़ कर पुलकित होता

और अपने किसी
मार्मिक हिस्से का स्पर्श कर
लौट आता
वहां
जहाँ से शुरू होती  है
एक नए दिन के साथ
खुद का नया रिश्ता पकड़ने की यात्रा

भीतर दिखती है जो
एक झलक
अपनी अनंतता की
सुबह सुबह
शाम तक 
विस्मृत हो जाती है अक्सर

यह एक चक्र सा
चलता है जो अनवरत
इसमें
विस्मृति का भी रचनात्मक योगदान है
तभी तो हर दिन
स्वयं को छू लेने के लिए
नए नए द्वार ढूंढता हूँ
और 
बार बार अपने विस्तार के प्रति
आश्वस्त होता हूँ

इस आश्वस्ति को
न ख़रीदा जा सकता है
न बेचा जा सकता है
पर ये बहुमूल्य है उतनी
जितना बहुमूल्य है जीवन


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
गुरुवार, २४ फरवरी 2011          
               

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

यह आश्वस्ति ही जीवन है।

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