Wednesday, February 23, 2011

सब कुछ हो जाता है आसान




जो भी है
अर्जित, संचित, सुरक्षित
सहेजा हुआ
अब तक

वो सब जो
नापा जा सकता है
किसी देश की मुद्रा में

और वह
जो देखा जा सकता है 
किसी की भाव-भंगिमा में

और वह भी
जिसे ना कोइ देख पाए
न पहचान पाए
पर जिससे संतोष झरता जाए

यह सब
आधार व्यवहार के
और स्वयं से प्यार के
टिके हुए हैं
एक सूक्ष्म दृष्टि पर

इसे बचाने की तरफ
जो दे पाता है ध्यान
उसके लिए 
सब कुछ हो जाता है आसान

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
               बुधवार, २३ फरवरी 2011        

2 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

एकै साधे सब सधे।

Ashok Vyas said...

sach kaha praveenji maharaj

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