Saturday, January 29, 2011

मेरे होने का सत्य




अब ये भी बोध है
कि सीमित तो है ही
देहयुक्त उपस्थिति का
यह काल,
 
पर यह सजगता भी कि
इस अवस्था के हर क्षण में 
बना रह सकता है
तादात्म्य अनंत से,
 
और यह अनुभूति भी कि
आनंद उमड़ने के साथ 
सहज ही फूटता है प्रेम 
सहज ही होती है
मंगल कामना सबके लिए,
 
किसी भी परिधि में सीमित 
नहीं है 
यह एक 
मेरे होने का सत्य 
 
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
२७ जनवरी 2011 

7 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

और यह अनुभूति भी कि
आनंद उमड़ने के साथ
सहज ही फूटता है प्रेम
सहज ही होती है
मंगल कामना सबके लिए

बहुत खूबसूरत रचना ...आनंद प्रदान करने वाली

प्रवीण पाण्डेय said...

आज मेरी पोस्ट का विषय भी देह की नश्वरता है।

सूर्यकान्त गुप्ता said...

अति गूढ़ बात ली हुई रचना।……शाश्वत सत्य को दर्शाती हुई।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 01- 02- 2011
को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

http://charchamanch.uchcharan.com/

Kailash C Sharma said...

गहन चिंतन से परिपूर्ण बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना..

S.M.HABIB said...

गूढ़ और सत्याभिव्यक्ति..... आभार...

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

बहुत खूब ...मर्मस्पर्शी भाव....

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