Sunday, January 30, 2011

वह जो पूर्ण है


एक तीर चलाने
के लिए
कई बरस की साधना

सध जाने के बाद भी
निरंतर अभ्यास

लक्ष्य तक पहुंचना
कितना सरल और सहज
पर
मांगता है
सतत सजगता, तत्परता

और इस तरह
अपने ही भीतर
होने लगता है प्रकट
वह
जो पूर्ण है

लक्ष्य तक पहुँचने
की निष्ठा और दृढ़ता में
होता है
निर्माण हमारा
अपने ही हाथों

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
३० जनवरी २०११


1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

जितना ऊपर पहुँचें, ध्येय उतना ही साधना पड़ता है।

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