Tuesday, January 25, 2011

एक नया उपहार



लो
आज एक नया उपहार
नए दिन के साथ
प्रेम की पालकी में सहेज कर
ममतामयी स्पर्श सहित
लेकर आ गयी है 
साँसों में 
गुनगुनाने वाली
सृष्टिकर्त्री माँ

उपहार विलक्षण 
कई परतों वाला 
उत्सुकता से खोलना है
एक के बाद दूसरी परत
दूसरी के बाद तीसरी
उत्साह के साथ धैर्य रहा
तो उपहार का मर्म समझ आये
शायद इसमें 
किसी अनमोल खजाने का नक्शा मिल जाए
संभव है कोई नायाब हीरा ही निकल आये
पर देखना,  बिना इसकी ओर देखे
सारा दिन यूं ही ना ढल जाए
ऐसा ना हो, कल तक ये उपहार, अनछुआ ही
जहाँ से आया है,वहीं फिर लौट जाए
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
मंगलवार, २५ जनवरी 2011




3 comments:

वन्दना said...

बेहद गहन अभिव्यक्ति।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

यह कैसा उपहार है ? इसकी गहनता तक नहीं पहुँच पायी ...

प्रवीण पाण्डेय said...

किस रूप में उपहार मिल जाये, नहीं ज्ञात।

कविता

कविता न नारा न विज्ञापन कविता सत्य खोजता मेरा मन कविता न दर्शन न प्रदर्शन कविता अनंत से खेलता बचपन कव...