Tuesday, January 4, 2011

सारा जग है साथ

 
 
जीवन उसके नाम कर, जिससे हैं सब नाम
दिखे कर्म करता मगर, नित्य करे विश्राम



मन में उसकी बात है, जिससे है हर बात
चले अकेला पर लगे, सारा जग है साथ


मौन मधुर संवाद का, जो देता है खोल
उन्नत करते हैं सदा, उसके दुर्लभ बोल


अर्पण के हर ढंग में, बजे एक ही तार
तरह तरह से पहुंचना, छोटी मैं के पार


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
मंगलवार, ४ जनवरी 2011

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

उस परम को प्रणाम।

कविता

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