Wednesday, January 5, 2011

जो ना कहा जा सके


कौन तय करता है 
मन का रास्ता
कैसे खुल जाती है
स्वर्णिम पगडंडी अनायास

स्वर्गारोहण देह छोड़ने से नहीं
बंधन से छूट जाने 
पर होता है संभव
जीते जीते
मुक्त आनंद का एक गतिमान स्पर्श

लो मन के लिए 
सुलभ है जो
अद्वितीय पावन अनुभूति इस क्षण
कौन टिका सकता है इसे

पुण्य क्षीण होते ही
आरोहण से अवरोहण का क्रम भी
सक्रिय हो जाता है अनायास

पुण्य बढ़ाने में भी
गणित नहीं है कोई
बस समर्पण है
और
यह समर्पण 'गूगल' पर 'क्रेडिट कार्ड' से नहीं मिलता
जहाँ से मिल सकता है
उस सूक्ष्म स्तर तक
किसी और को कोई नहीं ले जा सकता
और अहंकार का प्रवेश तो संभव ही नहीं

पर एक कुछ है 
हमारे भीतर
जो ना कहा जा सके
ना दिखाया जा सके
ना जिसके होने की पहचान पर 
आप घमंड कर सकें

ये सतत सुन्दर विस्तार सा
कौन खोल कर दिखा देता है
किसी एक निश्छल क्षण में

इसकी आभा ना दिखाए किसी को दिखे
ना छुपाये किसी से छुपे

जैसे की यह क्षण स्वतंत्र है मुझसे
शायद इसमें सम्माहित है शाश्वत
कुछ विशेष प्रकार से

ऐसे कि शब्द मुझे माध्यम बना कर
लिख रहे हैं
उसका पता
जिसे जानने का दावा 
कर भी नहीं सकता मैं

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
बुधवार, ५ जनवरी २०११
 

2 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

मन की शान्ति का रास्ता गूगल व क्रेडिट कार्ड से होकर तो बिल्कुल ही नहीं जाता है।

आशा said...

अच्छी पोस्ट बधाई |
आशा

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