Sunday, November 21, 2010

मौन मेरा इतना सुन्दर करने वाला




मौन मेरा इतना सुन्दर करने वाला 
खोल रहा हर एक पहेली का ताला
 
 निश्छल प्रेम झरे है मेरे अंतस में
लिए चलूँ साँसों में पावन मधुशाला
 
कई बरस तक गंध रही मेरेपन की
अब मुझसे हो मुक्त हुई उसकी माला

चल मन मौज मनाने के दिन आये हैं
आत्मसुधारस पीकर होले मतवाला
 
सारे बंधन भस्म हो गये क्षण भर में
कृपा किरण ने अद्भुत जादू कर डाला 


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
रविवार, २१ नवम्बर २०१०





 
, अचरज है

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

मौन कठिन है पर फलदायी है।

कविता

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