Friday, November 12, 2010

रंग तुम्हारे प्यार के



कोरा मन लेकर
कैसे आऊँ अब
तुम्हारे सामने
 
रंग तुम्हारे प्यार के
खिल गये हैं
इस तरह मुझमें 
 
कि अब ना मैं हूँ
ना मन ही मेरा
जो कुछ है बस
प्यार है तुम्हारा
 
और अब यूँ भी होना लगा है
अपना चेहरा देखते हुए 
बस प्यार का सागर दिखता है
जिसमें 
झिलमिलाती है
सारी सृष्टि तुम्हारी 
 
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
१२ नवम्बर 2010
 

4 comments:

POOJA... said...

बेहद खूबसूरत...

संजय भास्कर said...

सोचा की बेहतरीन पंक्तियाँ चुन के तारीफ करून ... मगर पूरी नज़्म ही शानदार है ...आपने लफ्ज़ दिए है अपने एहसास को ... दिल छु लेने वाली रचना ...

.....अपनी तो आदत है मुस्कुराने की !
नई पोस्ट पर आपका स्वागत है

वन्दना said...

और अब यूँ भी होना लगा है
अपना चेहरा देखते हुए
बस प्यार का सागर दिखता है
जिसमें
झिलमिलाती है
सारी सृष्टि तुम्हारी

वाह! यही तो होना चाहिये उसके बाद कोई चाह बचती कहाँ है।

प्रवीण पाण्डेय said...

रंग तुम्हारे प्यार के,
फैलें हर विस्तार के।

वहाँ जो मौन है सुंदर

वह जो लिखता लिखाता है कहाँ से हमारे भीतर आता है कभी अपना चेहरा बनाता कभी अपना चेहरा छुपाता है वह जो है शक्ति प्रदाता  ...