Saturday, November 13, 2010

सघन मौन का माधुर्य

 
मैंने
आभार की खिड़की खोली
कृतज्ञता की किरणों से जगमग करते आँगन में
आत्म-सौंदर्य का
अनछुआ आलोक
पसर गया

साँसों में
अनाम उल्लास का उजियारा फूटा
समर्पण की चहचहाहट करती
एक सौम्य चिड़िया ने 
दृष्टि मात्र से
गूंथ दिए
जीवन के सब बिखरे हिस्से

अब यह जो
सघन मौन का माधुर्य है
इसे लेकर
पारदर्शी हो गयी हैं
घर की दीवारें
या शायद
अब दीवार नहीं कोई
सृष्टि के इस छोर से उस छोर तक
जो फैलाव है
वही मेरा घर है


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१३ नवम्बर 2010

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

सृष्टि का फैलाव, सघन मौन, गहरा।

कविता

कविता न नारा न विज्ञापन कविता सत्य खोजता मेरा मन कविता न दर्शन न प्रदर्शन कविता अनंत से खेलता बचपन कव...