Saturday, September 24, 2016

विस्तार से आलिंगनबद्ध



१ 
यह एक 
फ्रेम सा 
बना कर 
मुक्ति का 
प्रसन्न होता 
सज कर 
शौ केस में  वह 
नहीं देखता 
मूढ़ता अपनी 
आड मालाओं की 
ढक लेती है 
क्षुद्रता 

इस तरह 
झूठ मूठ 
विस्तार से आलिंगनबद्ध होने का संतोष 
जो है उसके पास 
वह भी छल ही हुआ न ?

२ 
टूटन 
दरार 
रिसता है जो 
समय है 
मैं हूँ 

या कुछ और 
जिससे अलग हुए बिना 
खिल नहीं सकता 
पूर्ण स्वरुप मेरा 

३ 

आज फिर 
उनकी आँखों से 
शाश्वत धवल करूणामय 
तरल सा 
छल छला कर 
मुझ तक आया 
एक महीन मधुर क्षण में 
मैं 
सहज ही 
कृपा लहर में नहाया 

ये कुछ न होते हुए 
सब कुछ होना 
सुन्दर कैसे इतना 
जैसे मैं ने 
नव जीवन सा पाया 

२२ अगस्त २०१६ 
अरुणाचल आश्रम, न्यूयार्क 



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