Thursday, February 4, 2016

आलोक वृत्त


शिकायतों की श्रंखला 
धीरे धीरे मिटाता हूँ 
उपहार सुविधा वाले 
जब तब 
दे देकर स्वयं को 
तात्कालिकता से परे 
शाश्वत की सुध लेने का 
हौसला बढ़ाता हूँ 

२ 

थप थप बूंदों की 
सुनता हूँ 
चुप चाप रात में 
अकेला 
आलोक वृत्त के फैलाव का केंद्र 
मैं 
साँसों ही साँसों में 
तुझसे बतियाता हूँ 


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
४ फरवरी २०१६ 

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

अहा, बढ़ना कुछ अपनी ही ओर।

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...