Wednesday, February 26, 2014

वही मुक्तिदाता है


यह जो भाग दौड़ है 
हर दिन 
एक लक्ष्य के पीछे 
अपने आप को 
फिर फिर टटोलते हुए 
फिर फिर संवारते हुए 
रात दिन 
चिंतन नगरी में 
एक नया उत्सव सजाते हुए 
यह सब तैय्यारी 
जिसके लिए है 
उसे रिझाना क्या हो पाता  है 
और उसके लिए इस तरह नए नए रूपों में 
ढलते हुए 
क्या मैं मूल रूप में शेष रह जाता है 
२ 
तनाव रहित 
एकाकी क्षण में 
तटस्थ हुआ 
अपनी ही दौड़ के 
चल्यायमान स्मृति चित्र देखता 
यह 
मैं 
जो मुस्कुराता है 
इस मैं का 
उस भागते मैं से जो नाता है 
उस नाते को जो बनाता है 
हो न हो, वही मुक्तिदाता है 



अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
२६ फरवरी २०१४

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

चलचित्र से परे है अपनी पहचान।

सुंदर मौन की गाथा

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