Monday, August 5, 2013

कहने को बात तो ज़रा सी है




कहने को बात तो ज़रा सी है 
फिर हवाओं में क्यों उदासी है 
 
आज की बात में मिलावट है 
मेरे चेहरे पे कल की झांकी है

बच गए टूटने से चुप रह के
फिर लगे है कोई खता की है 

कहने सुनने का है हिसाब अजब 
जहाँ जमा है, वहीं बाकी है 
 
सिमट गया है अपने आप में वो 
ख्वाहिशें अब भी फड़फड़ाती हैं 


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
५ अगस्त २०१३
 






 
 

2 comments:

अनुपमा पाठक said...

बहुत खूब!

प्रवीण पाण्डेय said...

सुन्दर शब्दों में व्यक्त मन के भाव।

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...