Thursday, August 1, 2013

इतना कुछ जान कर


उसने कितना कुछ दिखलाया 
कभी गोद में उठा कर 
अपनी अँगुलियों से संकेत कर करके 
कभी शब्दों से दिशाबोध जगा कर 
कभी स्वयं विस्तार रूप लेकर 
कभी कर्म क्रीडा से नवसृजन कर 

उसने कितने धैर्य से 
कितनी करूणा से 
दिखलाया कई बार 
परम वैभव सृष्टि का 
और जगाया उत्साह 
स्वयं को समग्रता से अपनाते हुए 
सारे जगत को 
अपना लेने का 

वह प्यार के निश्छल, शुद्ध प्रवाह पर 
सहजता से 
नित्य आसीन 
इतना कुछ जान कर 
इतना कुछ बता कर 
कितना संयमित 
कितना सौम्य 
और 
परम गरिमा के साथ 
तन्मय अपनी पूर्णता में 
ना जाने कैसे 
नित्य मुक्त रहता निराशा से 
यह जान कर भी 
की 
उसके द्वारा 
सौंपी गयी 
दृष्टि का एक लघु अंश भी 
नहीं अपना पाया मैं 

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
१अगस्त २० १३

2 comments:

vandana gupta said...

आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा शनिवार(3-8-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
सूचनार्थ!

प्रवीण पाण्डेय said...

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