Friday, June 7, 2013

खंडित होने का स्वांग रचाते


कितना विचित्र है 
इस तरह होना 
अपने आप में पूर्ण 
और 
अपूर्णता से व्यवहार करना 

वह स्थल 
जहाँ से जाग्रत है 
बोध पूर्णता का 
अदृश्य ही नहीं अमान्य भी है 
इस समाज में 
जिसकी मान्यताओं को ओढ़ कर 
अपने को कहीं न कहीं छुपाये हुए 
खंडित होने का स्वांग रचाते 

एक दिन 
लौट कर 
छोड़ देते है
उस विचित्रता को 
जिसमें प्रश्न चिन्ह थे अपनी पूर्णता पर 

और 
सहज ही 
अपनी पूर्णता में रमे 
हम औरों द्वारा हम पर लादी पहचान से मुक्त 
तन्मय हो रहते हैं 
अपनी उस पहचान में 
जो कभी बदलती नहीं है 
पर नित्य नई है 



अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
७ जून २० १ ३

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