Wednesday, June 5, 2013

बस देखना भर है


 १ 
अब यह भी नहीं 
की 
उसके चले जाने से पहले 
यह कह लूं 
वह कर दूं 
अब यह भी नहीं 
की 
सोच लूं, जाने को जा सकता हूँ 
मैं ही 
उसके जाने के पहले 

२ 

अब 
सोच कर करने की उमंग नहीं है 
अब 
बस देखना भर है 
वह 
जो 
हो जाता हैं मेरे द्वारा 
मेरे न होने की सूरत में 

३ 

इस तरह भी हुआ जाता है 
न होकर 
 
और यूं होना
 ना जाने कैसे 
ले आता है
 उस पूर्णता का रस 
जिसका 
पता भी न था 
हो- होकर होते जाने के अधीर प्रयासों में 



अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
५ जून २ ० १ ३

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

जहाँ समय नहीं, आगे पीछे का बोध नहीं, बस उसी स्थान पर पूर्णता की चाह।

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...